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राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर पीएम मोदी की अपील, स्थानीय कपड़ों को अपनाएं, GRWM वीडियो करिए शेयर

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से स्थानीय हथकरघा कपड़ों को अपनाने और GRWM वीडियो के जरिए उन्हें प्रमोट करने की अपील की। जानिए समारोह की खास बातें, पुरस्कार, प्रदर्शनी और भारतीय हैंडलूम उद्योग का महत्व।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Fri, 07 Aug 2026 8:34:48

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर पीएम मोदी की अपील, स्थानीय कपड़ों को अपनाएं, GRWM वीडियो करिए शेयर

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से भारतीय हथकरघा उत्पादों और स्थानीय बुनाई को प्रोत्साहित करने की अपील की है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों से जुड़ते हुए एक वीडियो साझा किया और कहा कि भारत की समृद्ध हथकरघा परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का प्रभावी इस्तेमाल किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने खासतौर पर युवाओं से अपने पसंदीदा हथकरघा परिधानों में 'गेट रेडी विद मी' (GRWM) शैली के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा करने का आग्रह किया।

गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए गए अपने संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा कि 7 अगस्त राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में मनाया जाता है और यह अवसर देश की समृद्ध बुनाई परंपराओं को दुनिया के सामने लाने का है। उन्होंने लोगों से अपने पसंदीदा हथकरघा उत्पादों, पारंपरिक वस्त्रों और उनसे जुड़े अनुभवों के वीडियो साझा करने का आग्रह किया। साथ ही उन्होंने पोस्ट करते समय #NationalHandloomDay हैशटैग का उपयोग करने की भी अपील की, ताकि अधिक से अधिक लोग इस अभियान से जुड़ सकें और भारतीय हथकरघा उत्पादों को व्यापक पहचान मिल सके।

राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में होगा राष्ट्रीय समारोह

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के उपलक्ष्य में केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय 7 अगस्त को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह का आयोजन करेगा। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत की समृद्ध हथकरघा विरासत को प्रदर्शित करना और देश के सांस्कृतिक एवं आर्थिक विकास में बुनकर समुदाय के महत्वपूर्ण योगदान को सम्मान देना है।

कपड़ा मंत्रालय की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इस समारोह की मुख्य अतिथि होंगी। कार्यक्रम में केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह, कपड़ा राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा, कपड़ा सचिव नीलम शमी राव तथा विकास आयुक्त (हथकरघा) डॉ. एम. बीना सहित कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहेंगे।

पुरस्कार विजेताओं का होगा सम्मान

समारोह में देशभर से संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार से सम्मानित बुनकर अपने परिवारों के साथ हिस्सा लेंगे। इसके अलावा हथकरघा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ, पुरस्कार चयन समिति के सदस्य, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, मीडिया प्रतिनिधि और अन्य विशिष्ट अतिथियों की भी उपस्थिति रहेगी।

इस अवसर पर वर्ष 2025 के संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। कुल 22 पुरस्कार वितरित किए जाएंगे, जिनमें तीन संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और 19 राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार शामिल हैं। इन सम्मानों के जरिए उन बुनकरों को सम्मानित किया जाएगा, जिन्होंने अपनी उत्कृष्ट शिल्पकला, नवाचार और भारत की पारंपरिक हथकरघा कला के संरक्षण एवं संवर्धन में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

चार स्मारक डाक टिकट भी होंगे जारी

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह के दौरान भारत की समृद्ध और विविध हथकरघा बुनाई परंपराओं को समर्पित चार स्मारक डाक टिकट भी जारी किए जाएंगे। सरकार का मानना है कि इस तरह की पहल न केवल देश की पारंपरिक बुनाई कला को नई पहचान देगी, बल्कि स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने, बुनकरों की आजीविका मजबूत करने और ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को भी नई गति प्रदान करेगी।


समारोह में दिखेंगे हथकरघे के कपड़े

इस मौके पर "अर्थ. रूट. थ्रेड- सेंट्रल इंडिया के ऑल डाई किए हुए हथकरघा वस्त्र" और हथकरघा पुरस्कार पुस्तक-2025 का लोकार्पण किया जाएगा। इसके साथ ही पुरस्कार प्राप्त हथकरघा उत्पादों की विशेष प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी, जहां आगंतुक देश के विभिन्न हिस्सों की उत्कृष्ट बुनाई कला को करीब से देख सकेंगे।

समारोह में आने वाले लोगों को पारंपरिक कानी बुनाई और दीवार पर सजाए जाने वाले हस्तनिर्मित वस्त्रों की बुनाई का प्रत्यक्ष प्रदर्शन भी देखने का अवसर मिलेगा। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के उपलक्ष्य में देशभर में प्रदर्शनियों, विचार-विमर्श सत्रों, सम्मेलनों और जागरूकता कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाएगा। कपड़ा मंत्रालय के अनुसार, भारत का हथकरघा उद्योग 35 लाख से अधिक लोगों की आजीविका का आधार है, जिनमें 70 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं शामिल हैं। देश के अलग-अलग राज्यों की हैंडलूम साड़ियां और पारंपरिक वस्त्र न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखते हैं। यह क्षेत्र पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन प्रणाली को बढ़ावा देने के साथ-साथ देश की समृद्ध वस्त्र विरासत को भी संरक्षित कर रहा है।

हर वर्ष 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है। इस तिथि का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि 1905 में इसी दिन स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई थी। इस आंदोलन ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ-साथ भारतीय उद्योगों और हथकरघा क्षेत्र को नई ऊर्जा प्रदान की थी।

सांस्कृतिक विरासत और बुनकरों के योगदान का सम्मान

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि उन लाखों बुनकरों के परिश्रम, कला और समर्पण को सम्मान देने का अवसर है, जिन्होंने पीढ़ियों से भारत की पारंपरिक बुनाई कला को जीवित रखा है। यह दिवस देश की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक विकास में हथकरघा समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित करता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2015 में चेन्नई से राष्ट्रीय हथकरघा दिवस की शुरुआत की थी। तब से यह दिन भारतीय बुनकरों की प्रतिभा, शिल्पकौशल और रचनात्मकता का उत्सव बन चुका है। साथ ही यह सरकार की उस प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है, जिसके तहत हथकरघा क्षेत्र के संरक्षण, संवर्धन और सतत विकास को लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह अवसर उन कारीगरों को सम्मानित करने का भी है, जिन्होंने अपनी मेहनत और कला के बल पर भारत की सांस्कृतिक पहचान को पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रखा है।

गुजरात का हथकरघा उद्योग बना वैश्विक पहचान

गुजरात भी देश के प्रमुख हथकरघा केंद्रों में गिना जाता है। मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, राज्य में बुनाई केवल एक पारंपरिक कला नहीं बल्कि संस्कृति, शिल्पकौशल और लाखों लोगों की आजीविका से जुड़ी हुई है। पटोला और कच्छ की प्रसिद्ध बुनाई को अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और मध्य-पूर्व सहित कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विशेष पहचान मिली है। वैश्विक डिजाइनरों और नामचीन हस्तियों के बीच भी इन उत्पादों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।

सरकारी सहयोग, आधुनिक डिजाइन, बेहतर विपणन रणनीति और बढ़ती वैश्विक मांग के चलते गुजरात का हथकरघा उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है। वर्तमान में यह क्षेत्र 12 हजार से अधिक बुनकरों और कारीगरों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है तथा 51.07 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार दर्ज कर चुका है। इससे न केवल राज्य की आर्थिक गतिविधियों को मजबूती मिली है, बल्कि गुजरात की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी वैश्विक स्तर पर नई पहचान हासिल हुई है।

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