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'वंदे मातरम्' पर शर्मिला टैगोर की बात से भड़कीं कंगना, बोलीं- 'हिंदू-मुस्लिम वाली सोच से बाहर आइए'

वंदे मातरम् पर शर्मिला टैगोर के बयान के बाद कंगना रनौत ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने गीत को कला और राष्ट्रीय चेतना के व्यापक संदर्भ में देखने की बात कही।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Fri, 21 Aug 2026 11:44:52

'वंदे मातरम्' पर शर्मिला टैगोर की बात से भड़कीं कंगना, बोलीं- 'हिंदू-मुस्लिम वाली सोच से बाहर आइए'

राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जारी बहस अब बॉलीवुड की दो पीढ़ियों की अभिनेत्रियों के बीच वैचारिक टकराव का रूप लेती नजर आ रही है। वरिष्ठ अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के बयान पर अभिनेत्री और सांसद कंगना रनौत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। शर्मिला ने ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो छंदों को पर्याप्त बताते हुए कहा था कि बाद के हिस्सों में देवी-देवताओं के उल्लेख के कारण एक ईश्वर में आस्था रखने वाले लोगों को कुछ पंक्तियां असहज लग सकती हैं। इसके जवाब में कंगना ने कला और कविता को धार्मिक नजरिए से देखने पर सवाल उठाया और शर्मिला से अपनी सोच को ‘हिंदू-मुस्लिम’ के दायरे से बाहर रखने की अपील की।

शर्मिला टैगोर ने क्या कहा था?


समाचार एजेंसी आईएएनएस को दिए एक हालिया इंटरव्यू में शर्मिला टैगोर ने ‘वंदे मातरम्’ की प्रासंगिकता पर अपनी राय रखी थी। उन्होंने कहा कि अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं वाले लोगों को साथ लेकर चलने के लिहाज से गीत के शुरुआती दो छंद उपयुक्त हैं।

शर्मिला के मुताबिक, कुछ धार्मिक समुदाय केवल एक ईश्वर में विश्वास करते हैं और ऐसे लोगों के लिए उन छंदों को गाना कठिन हो सकता है, जिनमें काली और दुर्गा जैसी देवी-देवताओं का उल्लेख आता है। उनका सुझाव था कि सभी धर्मों के लोगों को साथ रखने के लिए शुरुआती दो छंदों तक सीमित रहना बेहतर हो सकता है।

कंगना रनौत ने इंस्टाग्राम पर दिया जवाब

शर्मिला टैगोर के बयान का वीडियो कंगना रनौत ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर शेयर किया और इसके साथ अपनी प्रतिक्रिया लिखी। उन्होंने कहा कि वह वरिष्ठ अभिनेत्री द्वारा अपनी राय रखने के अधिकार का सम्मान करती हैं, लेकिन कला और कविता की ऐसी व्याख्या उन्हें हैरान करती है।

कंगना के अनुसार, कविता और गीतों में कवि अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए प्रतीकों, कल्पनाओं और रूपकों का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से जोड़ते हुए कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसके माध्यम से देशवासियों के भीतर की शक्ति और ऊर्जा को जगाने का प्रयास किया था।

कंगना ने सवाल किया कि इतनी महत्वपूर्ण कलात्मक रचना को केवल धार्मिक अनुष्ठान के नजरिए से कैसे देखा जा सकता है।

'शक्ति' को लेकर कंगना ने दिया विवेकानंद का उदाहरण

अपने जवाब में कंगना ने ‘शक्ति’ शब्द के अर्थ को व्यापक संदर्भ में समझाने की कोशिश की। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के उस विचार का उदाहरण दिया, जिसमें उन्होंने मजबूत और ऊर्जावान युवाओं की जरूरत पर जोर दिया था।

कंगना ने कहा कि विवेकानंद जब युवाओं की ताकत की बात करते थे, तो उनका आशय देश की युवा शक्ति से था। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ में मौजूद शक्ति के संदर्भ को केवल धार्मिक प्रतीक मानने से असहमति जताई।

उन्होंने शर्मिला टैगोर से अपील करते हुए कहा कि इस विषय को हिंदू-मुस्लिम के नजरिए से देखने के बजाय सभी को एक-दूसरे को अपना मानकर आगे बढ़ना चाहिए।

'वंदे मातरम्' को लेकर पुरानी बहस फिर चर्चा में

‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी और बाद में इसे उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह रचना राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति के प्रमुख प्रतीकों में शामिल हो गई।

गीत के शुरुआती दो छंदों में भारत की प्राकृतिक सुंदरता और उसकी उर्वरता का वर्णन मिलता है। वहीं आगे के छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों के संदर्भ आते हैं। इसी वजह से इसके अलग-अलग हिस्सों को लेकर समय-समय पर वैचारिक और राजनीतिक चर्चा होती रही है।

शर्मिला टैगोर के बयान और कंगना रनौत की प्रतिक्रिया ने इसी पुरानी बहस को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। दोनों अभिनेत्रियों के विचार इस मुद्दे के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखते हैं, जहां एक ओर धार्मिक विविधता के संदर्भ में गीत की स्वीकार्यता पर सवाल है, वहीं दूसरी ओर कंगना इसे कविता, प्रतीक और राष्ट्रीय चेतना के व्यापक संदर्भ में देखने की बात कर रही हैं।

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