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'वाइड बॉल थी, छोड़ देते तो बेहतर होता'… वंदे मातरम् पर कांग्रेस में उठे सवाल, पार्टी के फैसले से अंदरूनी मतभेद!

वंदे मातरम् पर कांग्रेस के दो अंतरे गाने के फैसले के बाद पार्टी में रणनीति को लेकर सवाल उठे। कन्हैया कुमार और सिंघवी ने फैसले का बचाव किया।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Fri, 21 Aug 2026 11:38:45

'वाइड बॉल थी, छोड़ देते तो बेहतर होता'… वंदे मातरम् पर कांग्रेस में उठे सवाल, पार्टी के फैसले से अंदरूनी मतभेद!

कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की ओर से ‘वंदे मातरम्’ को लेकर 1937 के प्रस्ताव का पालन करने के फैसले के बाद पार्टी के भीतर ही रणनीति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस ने तय किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के केवल दो अंतरे ही गाए जाएंगे। जहां कांग्रेस इसे ऐतिहासिक निर्णय से जोड़कर देख रही है, वहीं पार्टी के कुछ नेताओं ने इसे मौजूदा राजनीतिक माहौल में उठाया गया ऐसा मुद्दा बताया है, जिसे टाला जा सकता था।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, CWC के एक सदस्य ने इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए इसे क्रिकेट की ‘वाइड बॉल’ से जोड़कर बताया। नेता के अनुसार, पार्टी इस मुद्दे पर आगे बढ़ने के बजाय इसे छोड़ सकती थी। उन्होंने यह भी कहा कि इस समय छात्रों की उम्मीदों और चंदा चोरी जैसे अन्य मुद्दे हैं, जिन पर सरकार को घेरा जा सकता है।

फैसले के बाद कांग्रेस में रणनीति पर मंथन

कांग्रेस के एक अन्य नेता ने पार्टी की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि संसद में एक बिल का विरोध उस समय नहीं हो सका, जब सदन में हंगामा चल रहा था और विधेयक शोर के बीच पारित हो गया। हालांकि, नेता ने यह भी स्वीकार किया कि संसद के बाहर भी पार्टी ने उस बिल के खिलाफ वैसा विरोध नहीं किया, जैसा परिसीमन और FCRA संशोधन विधेयकों के दौरान देखने को मिला था।

इससे संकेत मिलता है कि पार्टी के भीतर कुछ नेता मौजूदा राजनीतिक मुद्दों पर कांग्रेस की रणनीति को लेकर आत्ममंथन कर रहे हैं। हालांकि, वंदे मातरम् को लेकर सामने आई ये असहमतियां आधिकारिक तौर पर पार्टी के किसी नेता के बयान के रूप में सामने नहीं आई हैं।

कन्हैया कुमार ने फैसले का किया बचाव

कांग्रेस के CWC सदस्य कन्हैया कुमार ने पार्टी के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि पार्टी के सामने एक स्पष्ट और ठोस निर्णय लेना जरूरी था, ताकि कार्यकर्ताओं के बीच किसी तरह का भ्रम न रहे। उनके मुताबिक, स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी विरासत को सुरक्षित रखना कांग्रेस की अपनी विरासत का हिस्सा है।

इस तरह पार्टी के भीतर जहां कुछ नेताओं ने फैसले की टाइमिंग और रणनीतिक उपयोगिता पर सवाल उठाए, वहीं कन्हैया कुमार ने इसे संगठनात्मक स्पष्टता और ऐतिहासिक विरासत से जोड़कर उचित ठहराया।

अभिषेक मनु सिंघवी ने बीजेपी के आरोपों पर दिया जवाब


वरिष्ठ कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी इस मुद्दे पर पार्टी का पक्ष स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि संबंधित कानून राष्ट्रीय स्तर के आधिकारिक आयोजनों से जुड़ा है और घर, होटल या निजी संस्थानों में होने वाले कार्यक्रमों का उसमें उल्लेख नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कानून राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने या उसमें बाधा डालने को अपराध मानता है।

सिंघवी ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वह देशभक्ति के मुद्दे को ‘छह अंतरे’ की बहस में उलझाकर कांग्रेस के खिलाफ भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस ने ही ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा देने और उसे राष्ट्रगान के समान सम्मान दिलाने की दिशा में भूमिका निभाई थी।

1937 के प्रस्ताव पर कांग्रेस का भरोसा

कांग्रेस ने अपने फैसले को 1937 में हुए CWC के प्रस्ताव से जोड़कर रखा है। पार्टी के मुताबिक, उस समय महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और अन्य प्रमुख नेताओं की मौजूदगी में वंदे मातरम् के दो अंतरे गाने का निर्णय लिया गया था।

बुधवार को हुई बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इसी पुराने प्रस्ताव के कुछ हिस्सों का उल्लेख किया। पार्टी ने कहा कि वह उसी ऐतिहासिक निर्णय के अनुरूप अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के दो अंतरे ही गाएगी।

कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी कहा कि इस विषय पर पार्टी का रुख स्पष्ट है और इसमें किसी तरह का भ्रम नहीं है।

15 अगस्त के कार्यक्रम के बाद फिर चर्चा में आया मुद्दा

वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस के भीतर और बाहर चर्चा उस समय भी तेज हुई थी, जब 15 अगस्त को कांग्रेस कार्यालय में ध्वजारोहण कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रगीत के गायन के वक्त सोनिया गांधी को मल्लिकार्जुन खरगे की ओर कुछ इशारा करते हुए देखा गया था। इसके बाद इस घटनाक्रम को लेकर विवाद खड़ा हुआ था।

अब CWC के फैसले और पार्टी के कुछ नेताओं की रणनीतिक असहमति ने इस मुद्दे को एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। कांग्रेस अपने फैसले को 1937 के ऐतिहासिक प्रस्ताव से जोड़ रही है, जबकि पार्टी के भीतर से सामने आई टिप्पणियां बताती हैं कि कुछ नेता इस मुद्दे की राजनीतिक उपयोगिता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।

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