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ओरल कैंसर के इलाज में नई उम्मीद, अल्ट्रासाउंड तकनीक से कैंसर सेल्स खत्म करने के मिले संकेत

नई स्टडी में दावा किया गया है कि लो-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड तकनीक ओरल कैंसर सेल्स को निशाना बनाकर उन्हें खत्म करने में मदद कर सकती है। जानें IISc के शोध, संभावित फायदे और इस नई तकनीक से जुड़ी पूरी जानकारी।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Sat, 04 Jul 2026 9:16:25

ओरल कैंसर के इलाज में नई उम्मीद, अल्ट्रासाउंड तकनीक से कैंसर सेल्स खत्म करने के मिले संकेत

भारत में ओरल कैंसर तेजी से बढ़ती गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, तंबाकू, गुटखा और सुपारी के लगातार सेवन को इस बीमारी का प्रमुख कारण माना जाता है। वर्तमान समय में इसके उपचार के लिए मुख्य रूप से सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी का सहारा लिया जाता है। हालांकि इन उपचारों के दौरान केवल कैंसर कोशिकाएं ही नहीं, बल्कि आसपास मौजूद स्वस्थ कोशिकाएं भी प्रभावित हो जाती हैं, जिससे मरीजों को कई तरह के दुष्प्रभाव झेलने पड़ते हैं। इसी बीच एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने ओरल कैंसर के इलाज को लेकर नई उम्मीदें पैदा की हैं।

वैज्ञानिकों ने अल्ट्रासाउंड के जरिए खोजा नया तरीका

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए ताजा शोध में यह संकेत मिले हैं कि लो-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड की मदद से ओरल कैंसर की कोशिकाओं को प्रभावी ढंग से निशाना बनाया जा सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका असर मुख्य रूप से कैंसर कोशिकाओं पर होता है, जबकि आसपास मौजूद सामान्य और स्वस्थ कोशिकाओं को बहुत कम नुकसान पहुंचता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि आगे होने वाले अध्ययनों और परीक्षणों में भी ऐसे ही सकारात्मक परिणाम मिलते हैं, तो भविष्य में यह तकनीक ओरल कैंसर के इलाज के लिए अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित और कम दुष्प्रभाव वाला विकल्प साबित हो सकती है।

मरीजों से लिए गए ट्यूमर सैंपलों पर किया गया अध्ययन

इस रिसर्च को अंजाम देने के लिए वैज्ञानिकों ने एमएस रामैया मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के चिकित्सकों के साथ मिलकर काम किया। अध्ययन के दौरान लैब में विकसित कृत्रिम कैंसर कोशिकाओं की बजाय मरीजों के शरीर से प्राप्त ओरल ट्यूमर के वास्तविक नमूनों का उपयोग किया गया।

शोधकर्ताओं का कहना है कि वास्तविक मरीजों से लिए गए सैंपलों पर अध्ययन करने से उन्हें बीमारी के व्यवहार और उपचार के प्रभाव को अधिक सटीक ढंग से समझने का अवसर मिला। इससे शोध के निष्कर्ष वास्तविक परिस्थितियों के अधिक करीब माने जा रहे हैं।

हल्के मैकेनिकल दबाव को नहीं झेल पातीं कैंसर कोशिकाएं

स्टडी के दौरान यह भी पता चला कि ओरल कैंसर की कोशिकाएं अल्ट्रासाउंड से उत्पन्न होने वाले हल्के मैकेनिकल दबाव को सहन करने में सक्षम नहीं होतीं। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसके पीछे ट्रोपोमायोसिन 2.1 (Tropomyosin 2.1) नामक प्रोटीन की कमी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है।

यह प्रोटीन सामान्य कोशिकाओं को बाहरी दबाव और यांत्रिक प्रभावों को महसूस करने तथा उनके अनुरूप प्रतिक्रिया देने में मदद करता है। लेकिन कैंसर कोशिकाओं में इसका स्तर कम होने के कारण वे अल्ट्रासाउंड से पैदा होने वाले दबाव के सामने कमजोर पड़ जाती हैं और धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं। इसके विपरीत, स्वस्थ कोशिकाओं पर इस प्रक्रिया का प्रभाव बेहद सीमित देखा गया।

कैंसर के फैलाव को रोकने में भी मिल सकते हैं सकारात्मक नतीजे

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि अल्ट्रासाउंड केवल कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनकी फैलने की क्षमता को भी काफी हद तक कम कर सकता है। अध्ययन के अनुसार, यह तकनीक ट्यूमर के चारों ओर बनने वाली उस सुरक्षात्मक परत को भी कमजोर करती है, जो अक्सर दवाओं और शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाओं (इम्यून सेल्स) को कैंसर तक पहुंचने से रोकती है।

यदि यह प्रभाव आगे भी प्रमाणित होता है, तो भविष्य में कैंसर रोधी दवाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने और इम्यून सिस्टम को अधिक प्रभावी बनाने में भी इस तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

आगे के शोध पर टिकी हैं उम्मीदें

वैज्ञानिकों का कहना है कि अल्ट्रासाउंड चिकित्सा क्षेत्र में पहले से ही एक सुरक्षित, नॉन-इनवेसिव और व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक है। ऐसे में यदि आगामी प्रीक्लिनिकल और क्लिनिकल ट्रायल्स में भी इसके सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं, तो यह न केवल ओरल कैंसर बल्कि ब्रेस्ट कैंसर, स्किन कैंसर और अन्य प्रकार के कैंसर के उपचार में भी नई संभावनाओं का मार्ग खोल सकता है।

हालांकि शोधकर्ता यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि फिलहाल यह अध्ययन शुरुआती चरण में है। इसलिए इसे नियमित चिकित्सा पद्धति के रूप में अपनाने से पहले कई स्तरों पर विस्तृत परीक्षण, सुरक्षा मूल्यांकन और क्लिनिकल अध्ययन किए जाएंगे। इन प्रक्रियाओं के सफल होने के बाद ही इस तकनीक को व्यापक उपचार विकल्प के रूप में इस्तेमाल किए जाने की संभावना बनेगी।

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