बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। 13वें संसदीय चुनाव में प्रचंड जीत के बाद तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है। उन्होंने सरकार गठन का दावा भी पेश कर दिया है। 17 वर्षों तक देश से दूर रहने के बाद उनकी वापसी और सीधे सत्ता के शीर्ष तक पहुंचना बांग्लादेश की राजनीतिक कहानी का सबसे नाटकीय अध्याय बन चुका है। Bangladesh Nationalist Party (बीएनपी) की इस ऐतिहासिक जीत ने सत्ता परिवर्तन को औपचारिक रूप दे दिया है।
राजनीतिक विरासत में जन्मे नेता20 नवंबर 1965 को ढाका में जन्मे तारिक रहमान राजनीति की विरासत लेकर पैदा हुए। उनके पिता जिया-उर-रहमान बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति और बीएनपी के संस्थापक थे, जबकि उनकी मां खालिदा जिया तीन बार देश की प्रधानमंत्री रहीं। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि ने उन्हें कम उम्र से ही सत्ता और संगठन की बारीकियों से परिचित करा दिया था।
कहा जाता है कि 1990 के दशक में उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और 1991 के चुनाव में अपनी मां को सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उस दौर में वे संगठन के भीतर रणनीतिकार के रूप में उभर रहे थे।
‘हवा भवन’ से उभार और विवाद2001 में जब खालिदा जिया दोबारा सत्ता में लौटीं, तब तारिक पार्टी के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाने लगे। ढाका स्थित ‘हवा भवन’ को उनकी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र माना गया, जहां से पार्टी की रणनीतियां तय होती थीं।
हालांकि इसी समय उनके ऊपर भ्रष्टाचार, घूसखोरी और सत्ता के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप भी लगे। विपक्षी दल Awami League ने उन्हें ‘डार्क प्रिंस’ कहकर निशाना बनाया। इन आरोपों ने उनकी छवि को धूमिल किया और राजनीतिक विरोध तेज हो गया।
गिरफ्तारी, मुकदमे और 17 साल का वनवास2006-07 में देश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी और सैन्य समर्थित अंतरिम सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान छेड़ दिया। मार्च 2007 में तारिक रहमान को अचानक गिरफ्तार कर लिया गया। उनके खिलाफ 84 मुकदमे दर्ज किए गए, जिनमें वित्तीय अनियमितताओं से लेकर 2004 के ग्रेनेड हमले तक के आरोप शामिल थे।
बीएनपी लगातार इन मामलों को राजनीतिक साजिश बताती रही और इसका आरोप तत्कालीन सत्ता नेतृत्व पर लगाती रही। जेल में रहते हुए तारिक ने कथित यातनाएं झेलीं और उनकी रीढ़ की हड्डी को गंभीर क्षति पहुंचने की बात भी सामने आई।
सितंबर 2008 में जमानत मिलने के बाद वे इलाज के बहाने अपनी पत्नी जुबैदा और बेटी ज़ैमा के साथ लंदन चले गए। 11 सितंबर 2008 को देश छोड़ने के बाद वे लगातार 17 वर्षों तक स्व-निर्वासन में रहे। इस दौरान उन्होंने लंदन से ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और डिजिटल माध्यमों से पार्टी का संचालन जारी रखा।
मौत की सजा से ‘क्लीन चिट’ तकपूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के लंबे शासनकाल में एक मामले में उन्हें मौत की सजा भी सुनाई गई। इसके बावजूद उन्होंने बांग्लादेश लौटने का जोखिम नहीं उठाया।
अगस्त 2024 में छात्र आंदोलनों और राजनीतिक उथल-पुथल के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और अंतरिम सरकार का गठन किया गया, जिसकी अगुवाई मुहम्मद यूनुस ने की। इसी दौर में अदालतों ने तारिक के खिलाफ चल रहे मुकदमों को खारिज कर दिया।
दिसंबर 2025 में उन्होंने औपचारिक रूप से स्वदेश वापसी की घोषणा की। 25 दिसंबर को ढाका एयरपोर्ट पर उनका भव्य स्वागत हुआ। हजारों-लाखों समर्थकों की मौजूदगी में यह वापसी किसी राजनीतिक पुनर्जन्म से कम नहीं थी।
वापसी के 50 दिन बाद चुनावी मैदान मेंढाका लौटने के कुछ ही दिनों बाद उनकी मां खालिदा जिया का निधन हो गया। शोक के इस दौर के बावजूद उन्होंने तेजी से राजनीतिक गतिविधियां शुरू कीं। मात्र 50 दिन के भीतर वे चुनावी मैदान में उतर गए।
उन्होंने ढाका-17 और बोगुरा-6 सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों जगह जीत हासिल की। यह दोहरी जीत उनके नेतृत्व पर जनता के भरोसे का संकेत मानी जा रही है।
नई राजनीति का वादाबीएनपी की जीत के बाद तारिक रहमान ने साफ संदेश दिया कि उनकी प्राथमिकता कानून-व्यवस्था सुधारना, भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपनाना, युवाओं को रोजगार देना और लोकतंत्र को मजबूत करना होगा।
60 वर्षीय तारिक को उनके समर्थक ‘नरम स्वभाव’ और संवादप्रिय नेता के रूप में पेश करते हैं। हालांकि आलोचक उनके अतीत को याद दिलाते रहते हैं, लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें एक नए अवसर के साथ राष्ट्रीय नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंप दी है।
जिस नेता को कभी जेल, निर्वासन और मौत की सजा जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, वही अब देश की सर्वोच्च कार्यकारी कुर्सी संभालने जा रहा है। बांग्लादेश की राजनीति में यह बदलाव न केवल सत्ता परिवर्तन है, बल्कि एक ऐसे अध्याय की शुरुआत भी है, जो आने वाले वर्षों में देश की दिशा तय करेगा।