अमेरिका ने बुधवार, 7 जनवरी 2026 को उत्तरी अटलांटिक में रूस से जुड़े टैंकर बेला 1 को जब्त कर लिया, जिससे व्लादिमीर पुतिन बेहद नाराज हैं। यह टैंकर वेनेजुएला के पास अमेरिकी नौसेना की घेराबंदी तोड़कर भाग रहा था और इस पर रूस का झंडा लगा था। अमेरिका की इस कार्रवाई पर रूस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसे समुद्री डकैती करार दिया। इसके साथ ही रूस ने वेनेजुएला पर ट्रंप प्रशासन की कार्रवाई को लेकर भी नाराजगी जताई है। इस घटना के बाद रूस और अमेरिका के बीच तनाव और बढ़ता नजर आ रहा है।
अब सवाल उठता है कि क्या रूस इसका बदला लेगा? क्या दुनिया की ये दो सबसे बड़ी न्यूक्लियर शक्तियां आपस में टकरा सकती हैं? अगर ऐसा हुआ, तो न केवल करोड़ों लोग अपनी जान गंवाएंगे बल्कि लाखों लोग गंभीर रूप से जख्मी होंगे। इस संघर्ष के असर अगले कई सालों तक महसूस किए जा सकते हैं, और आने वाली पीढ़ियों पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा।
18 सितंबर 2019 को icanw.org में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर रूस और अमेरिका के बीच न्यूक्लियर युद्ध होता है, तो शुरुआती कुछ घंटों में ही लगभग 3.41 करोड़ लोगों की मौत हो सकती है और 5.74 करोड़ लोग गंभीर रूप से जख्मी हो सकते हैं। यह आंकड़ा 2013 में International Physicians for the Prevention of Nuclear War की स्टडी पर आधारित था।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि केवल प्रारंभिक परिणाम ही भयावह नहीं होंगे। रेडियोधर्मिता फैलने के कारण पर्यावरण और मौसम पर भी भारी असर पड़ेगा। पृथ्वी के तापमान में असामान्य गिरावट, कृषि उत्पादों में कमी और जलवायु असंतुलन जैसी समस्याएं देखने को मिलेंगी।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच कोई सीमित न्यूक्लियर युद्ध होता है, तो स्थिति और भी गंभीर होगी। इससे 1 अरब से अधिक लोग भुखमरी की चपेट में आएंगे और लगभग 1.3 अरब लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना करने को मजबूर होंगे।
अध्ययनों के अनुसार, रूस के पास वर्तमान में 5,449 और अमेरिका के पास 5,277 न्यूक्लियर हथियार हैं। इस विशाल न्यूक्लियर क्षमता को देखते हुए, किसी भी टकराव का परिणाम मानवता के लिए बेहद विनाशकारी हो सकता है।