चांद की सतह पर करीब दो साल पहले हुई एक बेहद शक्तिशाली टक्कर का निशान अब वैज्ञानिकों को मिला है। नासा के लूनर रिकॉनसेंस ऑर्बिटर यानी LRO की तस्वीरों के विश्लेषण में करीब 728 फीट चौड़ा और 141 फीट तक गहरा नया क्रेटर सामने आया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह हाल के समय में सौरमंडल में पहचाना गया सबसे बड़ा ज्ञात इंपैक्ट क्रेटर है। इस खोज से यह भी पता चला है कि चांद की सतह पर होने वाली ऐसी टक्करों का असर आसपास के बड़े इलाके तक पहुंच सकता है।
इस खोज से जुड़ी दो अलग-अलग स्टडी बुधवार को साइंस अडवांसेज जर्नल में प्रकाशित हुई हैं। वैज्ञानिकों ने इस घटना को बेहद दुर्लभ बताया है। उनके अनुमान के मुताबिक, इतनी बड़ी टक्कर औसतन करीब 132 साल में एक बार हो सकती है। यही वजह है कि करीब दो साल पुरानी इस घटना का बाद में पता चलना वैज्ञानिकों के लिए खास महत्व रखता है।
728 फीट चौड़ा और 141 फीट गहरा है नया क्रेटरLRO ने मई 2024 में चांद के उस हिस्से की तस्वीरें ली थीं, जो पृथ्वी से दिखाई देता है। इन्हीं तस्वीरों में बाद में इस नए क्रेटर की पहचान हुई। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह गड्ढा किसी क्षुद्रग्रह या धूमकेतु के टूटे हुए हिस्से के चांद की सतह से टकराने के कारण बना।
इस क्रेटर की चौड़ाई करीब 728 फीट यानी लगभग 222 मीटर और गहराई 141 फीट यानी करीब 43 मीटर मापी गई है। इसका नाम दिवंगत वैज्ञानिक थॉमस मैकगेटचिन के नाम पर रखा गया है। मैकगेटचिन ह्यूस्टन स्थित लूनर एंड प्लेनेटरी इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक थे।
वैज्ञानिकों के लिए इस खोज की अहमियत इसलिए भी अधिक है क्योंकि LRO ने इससे पहले करीब एक दशक पहले जिस क्रेटर को रिकॉर्ड के तौर पर दर्ज किया था, नया क्रेटर उससे लगभग तीन गुना बड़ा है।
टक्कर का असर 100 किलोमीटर से ज्यादा इलाके तकअध्ययन में सिर्फ नए गड्ढे की जानकारी सामने नहीं आई है। वैज्ञानिकों ने टक्कर के प्रभाव को क्रेटर के आसपास के इलाके में भी देखा। उनके मुताबिक, इस घटना से चांद की सतह 100 किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में प्रभावित हुई।
टक्कर के दौरान धूल और चट्टानी मिट्टी बड़ी मात्रा में उछली और अनुमान से अधिक ऊंचे कोण पर दूर तक फैल गई। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल रही है कि चांद पर किसी बड़े पिंड के टकराने के बाद सतह किस तरह बदलती है।
LRO कैमरों के प्रमुख वैज्ञानिक और इंट्यूटिव मशीन्स से जुड़े मार्क रॉबिन्सन इस अध्ययन के प्रमुख लेखक हैं। उन्होंने इस घटना को वैज्ञानिकों के लिए अत्यंत दुर्लभ अवलोकन बताया है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भी इसे सांख्यिकीय रूप से बेहद दुर्लभ और प्रभावी तौर पर जीवन में एक बार मिलने वाला अवलोकन बताया है।
दो साल तक तस्वीरों में छिपा रहा क्रेटरसबसे दिलचस्प बात यह है कि इतनी बड़ी टक्कर के बावजूद इसका पता तुरंत नहीं चल पाया। मई 2024 में LRO ने इस क्षेत्र की वाइड-एंगल तस्वीरें ली थीं, लेकिन इन तस्वीरों में मौजूद भारी मात्रा के डेटा के बीच नया क्रेटर तुरंत पहचाना नहीं जा सका।
अगस्त 2025 में वैज्ञानिकों ने पुरानी तस्वीरों का दोबारा विश्लेषण करते हुए इस नए गड्ढे को पहचाना। इसके बाद LRO ने पिछले जाड़े में उसी क्षेत्र की और अधिक विस्तृत तस्वीरें लीं। इन अतिरिक्त अवलोकनों के आधार पर इस खोज की पुष्टि इस साल की शुरुआत में हुई।
इस तरह चांद पर हुई टक्कर का निशान घटना के करीब दो साल बाद वैज्ञानिकों के सामने आया।
आसपास मिला करीब 7 किलोमीटर चौड़ा ठंडा क्षेत्रदूसरी स्टडी में शोधकर्ताओं ने क्रेटर के आसपास करीब 7 किलोमीटर चौड़ा एक ठंडा क्षेत्र भी दर्ज किया। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह इस बात का संकेत है कि टक्कर के दौरान चांद की ऊपरी मिट्टी ढीली हुई और बड़े पैमाने पर उलट-पुलट गई।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिलिस यानी UCLA के अध्ययन के सह-लेखक डेविड पेज ने इस प्रक्रिया को बागवानी में मिट्टी पलटने से समझाया। उनके मुताबिक, ऐसी टक्करें चांद की सतह के नीचे मौजूद सामग्री को ऊपर ला सकती हैं और सतह पर मौजूद तलछट को भी बदल देती हैं।
इससे वैज्ञानिकों को चांद की मिट्टी में होने वाले बदलावों और वहां मौजूद सामग्री के लगातार ऊपर-नीचे होने की प्रक्रिया को समझने का नया अवसर मिला है।
चांद की मिट्टी के बदलने की रफ्तार पर भी मिली जानकारी2009 में लॉन्च किए गए LRO ने चांद की सतह पर अब तक बड़ी संख्या में नए क्रेटर खोजे हैं। इन अवलोकनों से वैज्ञानिकों को चांद की ऊपरी मिट्टी के लगातार बदलने की प्रक्रिया के बारे में भी नई जानकारी मिली है।
अध्ययनों के अनुसार, चांद की ऊपरी करीब एक इंच यानी लगभग 2 सेंटीमीटर मिट्टी उल्कापिंडों से उछलकर आने वाली सामग्री के कारण लगभग हर 80,000 साल में पलट जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रक्रिया पहले लगाए गए अनुमानों की तुलना में अधिक तेजी से हो रही है।
इसका असर चांद पर इंसानों द्वारा छोड़े गए निशानों की स्थायित्व को लेकर भी दिखाई देता है। अपोलो मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों के पैरों के निशानों के हमेशा बने रहने की धारणा को इस अध्ययन से चुनौती मिलती है। रॉबिन्सन के मुताबिक, इस समय-सीमा के हिसाब से ऐसे निशान निश्चित रूप से बहुत पहले गायब हो चुके होंगे।
भविष्य के मून बेस के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खोजचांद पर इतने बड़े क्रेटर की खोज ऐसे समय हुई है जब नासा भविष्य में वहां अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बेस बनाने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में वैज्ञानिकों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में होने वाली बड़ी टक्करों से निकलने वाली चट्टानें और मलबा चांद की सतह पर मौजूद किसी बेस तक कितनी दूर पहुंच सकते हैं।
रॉबिन्सन के अनुसार, अब वैज्ञानिकों का अगला कदम यह गणना करना है कि इस क्रेटर से बाहर निकली सामग्री नासा के प्रस्तावित मून बेस तक पहुंचकर कितना जोखिम पैदा कर सकती है। ऐसी गणनाओं से इंजीनियरों को भविष्य में चांद पर बनाई जाने वाली संरचनाओं को संभावित टक्करों और उनसे निकलने वाले मलबे से बेहतर तरीके से सुरक्षित करने में मदद मिल सकती है।