मालेगांव विस्फोट: योगी आदित्यनाथ को भी फंसाने की रची गई थी साजिश – गवाह

मालेगांव धमाके से जुड़ा भगवा आतंकवाद का पूरा नैरेटिव अब सवालों के घेरे में है। हाल ही में मुंबई की एक विशेष अदालत ने इस केस में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित समेत सभी सात आरोपियों को दोषमुक्त करार देते हुए साफ कर दिया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य अपर्याप्त थे। इस निर्णय के बाद न केवल जांच एजेंसियों की भूमिका पर उंगलियां उठीं, बल्कि कांग्रेस के उस राजनीतिक नैरेटिव पर भी व्यापक बहस छिड़ गई, जिसमें ‘हिंदू आतंकवाद’ की अवधारणा को हवा दी गई थी।

सरकारी गवाह का दावा – दबाव डालकर करवाना चाहते थे झूठी गवाही

इस केस में सरकार के पक्ष से पेश किए गए 39 गवाहों में से एक गवाह मिलिंद जोशी ने बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियों ने उन पर दबाव बनाया कि वे आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और उस समय गोरखपुर से सांसद रहे योगी आदित्यनाथ का नाम इस मामले से जोड़ें। गवाह का दावा है कि उन्हें हिरासत में रखकर मानसिक और शारीरिक दबाव डाला गया ताकि वे जबरन उन नामों का उल्लेख करें जो मामले से वास्तविक रूप से जुड़े ही नहीं थे।

हिंदुत्व नेताओं को निशाना बनाने की थी रणनीति

योगी आदित्यनाथ, जो अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, उस वक्त भी अपने तीखे हिंदुत्ववादी बयानों के लिए जाने जाते थे। दूसरी ओर, मोहन भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शीर्ष नेतृत्व में शामिल थे और उन्हें संघ प्रमुख बनाए जाने की चर्चा तेज हो चुकी थी। इन परिस्थितियों में उन दोनों नेताओं को मालेगांव केस में फंसाना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। गवाह मिलिंद जोशी के अनुसार, जांच एजेंसियां इस केस का इस्तेमाल एक खास राजनीतिक विचारधारा को बदनाम करने के लिए करना चाहती थीं।

महबूब मुजावर का दावा – केस को जानबूझकर भगवा रंग दिया गया

इस मामले की जांच से जुड़ चुके अधिकारी महबूब मुजावर ने भी चौंकाने वाली बातें बताईं। उन्होंने कहा कि इस केस को शुरू से ही इस रूप में पेश किया गया मानो देश में ‘भगवा आतंकवाद’ जैसी कोई संगठित साजिश चल रही हो। मुजावर का आरोप है कि तत्कालीन राजनीतिक सत्ता ने इस मामले का इस्तेमाल हिंदुत्व के प्रभाव को कुंद करने के लिए किया।

अदालत ने क्या कहा अपने फैसले में?

विशेष अदालत ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि आतंकवाद को किसी भी धर्म से जोड़ना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि सिर्फ कहानियों और अटकलों के आधार पर अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता — ठोस और तकनीकी साक्ष्य की आवश्यकता होती है, जो कि इस मामले में उपलब्ध नहीं थे। कोर्ट के मुताबिक, आरोपों को साबित करने के लिए जो आवश्यक प्रमाण होने चाहिए थे, वे किसी भी स्तर पर जांच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत नहीं किए गए।

कौन-कौन थे आरोपी और क्या था मामला?

मालेगांव धमाके के इस हाई प्रोफाइल केस में जिन सात लोगों को आरोपी बनाया गया, उनमें प्रमुख नाम थे — प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, मेजर (रि.) रमेश उपाध्याय, अजय राहिरकर, सुधाकर चतुर्वेदी, समीर कुलकर्णी और सुधाकर धर द्विवेदी। इन सभी पर आरोप था कि इन्होंने साजिश रचकर 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव के भीकू चौक पर विस्फोट कराया, जिसमें छह लोगों की जान गई और सौ से अधिक लोग घायल हुए। धमाका एक मोटरसाइकिल में लगाए गए विस्फोटक से हुआ था, जिसे एक मस्जिद के पास खड़ा किया गया था। जांच में पाया गया कि मोटरसाइकिल के नंबर प्लेट से छेड़छाड़ की गई थी, और मूल रजिस्ट्रेशन प्रज्ञा ठाकुर के नाम पर था। इसी आधार पर उन्हें मुख्य आरोपी बनाया गया।

राजनीति में फिर गर्माया 'भगवा आतंकवाद' का मुद्दा

इस केस में अदालत द्वारा सभी आरोपियों को बरी किए जाने के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर पलटवार किया है। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस ने हिंदू समुदाय और हिंदुत्व से जुड़ी संस्थाओं की छवि को धूमिल करने के लिए यह 'भगवा आतंकवाद' का षड्यंत्र रचा था। अब जब न्यायालय ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया है, तो कांग्रेस को देश से माफी मांगनी चाहिए।