देशभर में पेट्रोल पंपों की बढ़ती संख्या पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने संतोष जताते हुए एक अहम मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया है। उन्होंने कहा कि भले ही देश में पेट्रोल पंपों की संख्या एक लाख के पार पहुंच जाना एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इन पंपों पर मौजूद बुनियादी सुविधाओं, खासकर शौचालयों की हालत गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। गहलोत ने सुझाव दिया कि हर पेट्रोल पंप पर स्वच्छता और सुविधाओं के मानकों को सुनिश्चित करने के लिए कम से कम 15 दिनों का विशेष अभियान चलाया जाना चाहिए। उन्होंने यह बात शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा की।
स्वच्छता की कमी महिलाओं के लिए बड़ी परेशानीअपने पोस्ट में अशोक गहलोत ने लिखा कि देश में पेट्रोल पंपों का विस्तार होना खुशी की बात है और इसके साथ ही भारत दुनिया के उन देशों में शामिल हो गया है, जहां पेट्रोल पंपों की संख्या सबसे अधिक है। आज देशभर में हाईवे, एक्सप्रेसवे और स्टेट हाईवे का बड़ा नेटवर्क तैयार हो चुका है, जिन पर लोग परिवार के साथ लंबी यात्राएं करते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इन मार्गों पर मौजूद कई पेट्रोल पंपों के शौचालय या तो बेहद गंदे होते हैं या फिर अक्सर बंद रहते हैं। यह स्थिति यात्रियों के लिए, विशेषकर महिलाओं के लिए, बेहद असुविधाजनक और पीड़ादायक साबित होती है।
गहलोत ने आगे याद दिलाया कि पेट्रोलियम मंत्रालय की मार्केटिंग डिसिप्लिन गाइडलाइंस (MDG) के तहत स्वच्छ शौचालय, पीने का साफ पानी और हवा भरने जैसी सुविधाएं कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार हैं। इन बुनियादी सेवाओं को मुफ्त उपलब्ध कराना हर पेट्रोल पंप संचालक की जिम्मेदारी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
यात्रियों की सुविधाओं पर हो सख्त निगरानीपूर्व मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार और पेट्रोलियम मंत्रालय से अपील की कि केवल पेट्रोल पंपों की संख्या बढ़ाने तक सीमित न रहा जाए, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाए कि हर पंप पर स्वच्छता और जनसुविधाओं के तय मानकों का कड़ाई से पालन हो। इसके लिए उन्होंने 15 दिनों का विशेष निरीक्षण और जागरूकता अभियान चलाने का सुझाव दिया, ताकि नियमों की अनदेखी करने वाले पेट्रोल पंप संचालकों पर सख्त कार्रवाई की जा सके।
गहलोत का कहना है कि जब तक इस तरह के ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक यात्रियों को वास्तविक राहत नहीं मिल पाएगी। यात्रियों की सुविधा और सम्मान से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं होना चाहिए, खासकर तब जब देश तेजी से बुनियादी ढांचे के विस्तार की ओर बढ़ रहा है।