दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने दिल्ली में लोगों की आवाजाही सामान्य करने, इंटरनेट सेवा बहाल करने और जगह-जगह लगाए गए बैरिकेड हटाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि मेट्रो सेवाएं सामान्य समय-सारणी के अनुसार चलनी चाहिए और किसी भी व्यक्ति को अपने पेशे से जुड़े काम करने में परेशानी नहीं होनी चाहिए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को अवमानना का नोटिस भी जारी किया है। जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास रोके जाने से जुड़ी अवमानना याचिका के साथ हिरासत में लिए गए लोगों के मामले में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई की। अदालत के सामने यह सवाल भी उठा कि दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान लगाए गए प्रतिबंध संवैधानिक अधिकारों के दायरे में किस हद तक उचित ठहराए जा सकते हैं।
बैरिकेड हटाने और इंटरनेट सेवा बहाल करने का निर्देशसुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में लोगों की सामान्य आवाजाही सुनिश्चित की जानी चाहिए। शहर में अलग-अलग जगह लगाए गए बैरिकेड हटाए जाएं और उन्हें केवल उन्हीं स्थानों पर रखा जाए, जहां उनकी वास्तविक जरूरत हो। अदालत ने इंटरनेट सेवा को भी सामान्य रूप से बहाल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने मेट्रो को सामान्य समय-सारणी के अनुसार चलाने पर जोर देते हुए कहा कि प्रतिबंधों के कारण लोगों को अपने कामकाज और पेशे से जुड़ी गतिविधियां करने में परेशानी नहीं होनी चाहिए। हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए जरूरत पड़ने पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 19(2) का भी उल्लेख हुआ। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि पुलिस की ओर से लगाए गए प्रतिबंध किस सीमा तक संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हैं। कोर्ट ने प्रदर्शन के अधिकार को स्वीकार करते हुए यह भी कहा कि विरोध-प्रदर्शन की प्रक्रिया कानून के दायरे में रहनी चाहिए और इसे पुलिस एक्ट से ऊपर नहीं माना जा सकता।
दिल्ली पुलिस को अवमानना का नोटिस क्यों मिला?सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद दिल्ली में 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास रोका गया तथा लगभग चार किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट सेवा पर भी रोक लगाई गई। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इन परिस्थितियों को अदालत के आदेशों की अवमानना से जुड़ा मुद्दा बताया। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि प्रदर्शन के दौरान लोगों को अलग-अलग जगहों पर हिरासत में लिया गया और आवाजाही पर जरूरत से ज्यादा प्रतिबंध लगाए गए। वकीलों ने अदालत से दिल्ली में स्वतंत्र आवाजाही सुनिश्चित करने और बैरिकेड हटाने का निर्देश देने की मांग की। दूसरी ओर, केंद्र सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मेट्रो सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं थीं। उनके मुताबिक, दिल्ली के कुल 303 मेट्रो स्टेशनों में से 45 स्टेशनों पर ही प्रवेश और निकास रोका गया था। उन्होंने यह भी कहा कि सभी स्टेशन पिछली रात 10 बजे से खोल दिए गए थे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि पहले 57 स्टेशनों के बंद होने की बात कही गई थी, जबकि बाद में संख्या 45 बताई गई। अदालत ने जानना चाहा कि आखिर किन आधारों पर इन स्टेशनों को बंद करने का फैसला लिया गया था।
हिरासत में लिए गए लोगों को लेकर भी उठे सवालसुनवाई में हिरासत में लिए गए लोगों का मामला भी प्रमुखता से उठा। याचिकाकर्ताओं की तरफ से दलील दी गई कि प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया और कई लोगों को प्रदर्शन स्थल तक जाने से रोकने के लिए सख्त कदम उठाए गए। वरिष्ठ वकील राकेश खन्ना ने दावा किया कि दिल्ली के बाहर से आए आम लोगों को भी हिरासत में लिया गया। उन्होंने लगभग 7,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात कही और बताया कि इनमें तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल थे। वहीं, वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने अदालत में कहा कि 7,000 से अधिक लोगों, जिनमें छात्र नेता और पत्रकार भी शामिल थे, को हिरासत में लिए जाने का मामला सामने आया है। उन्होंने यह भी कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों की सही संख्या पुलिस की ओर से स्पष्ट नहीं की गई। याचिकाकर्ताओं ने इन परिस्थितियों को नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार से जुड़ा गंभीर मामला बताया। इसके जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कुछ लोगों को दोपहर करीब दो बजे हिरासत में लिया गया था और उन्हें शाम छह बजे तक छोड़ दिया गया। उन्होंने दलील दी कि ऐसे में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका अब विचार योग्य नहीं रह जाती। उन्होंने यह भी कहा कि अवमानना के आरोपों के संबंध में सरकार का विस्तृत जवाब अभी तैयार नहीं था।
पुलिस की कार्रवाई और वकीलों के आरोपों पर भी चर्चासुनवाई के दौरान कुछ वकीलों ने पुलिस की कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाए। याचिकाकर्ताओं की तरफ से कहा गया कि कुछ पुलिसकर्मी नेम प्लेट या बैज नहीं लगा रहे थे, जिससे उनकी पहचान करने में परेशानी हो रही थी। अदालत से इस संबंध में निर्देश देने की मांग भी की गई। वकीलों ने आरोप लगाया कि हिरासत में लिए गए लोगों को थाने में अपने वकीलों से मिलने नहीं दिया जा रहा था और कुछ पुलिसकर्मियों ने वकीलों को एफआईआर दर्ज करने की धमकी भी दी। वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा कि वकीलों को उनके पेशे से जुड़े काम करने से रोकना गलत है। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि वकीलों के साथ ऐसा व्यवहार न हो। उन्होंने संजय कॉलोनी थाने में एक वकील के साथ मारपीट किए जाने का आरोप भी लगाया।
एक अन्य वकील ने दावा किया कि कुछ वकीलों को उनके चैंबर से हिरासत में लिया गया। वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने अदालत में कहा कि उन्हें चलती बस से बाहर फेंका गया था। उन्होंने इसे केवल अपने व्यक्तिगत मामले के बजाय नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा बताया। इन आरोपों पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस को ऐसा स्वतंत्र अधिकार नहीं मिल जाता कि वह राज्य की दलीलों से अलग अपना पक्ष रखे। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी पुलिस अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से नुकसान पहुंचा है, तो वह अलग से अदालत का रुख कर सकता है। अदालत ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा करना उसकी जिम्मेदारी है। पीड़ित पुलिसकर्मी हो, वकील हो या आम नागरिक, अदालत के लिए सभी के अधिकारों की सुरक्षा समान रूप से महत्वपूर्ण है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?सुनवाई के दौरान जस्टिस वी. मोहना ने कहा कि यदि प्रदर्शन करने वाले लोग जनहित को लेकर चिंतित हैं, तो उन्हें यह भरोसा देना चाहिए कि उनका विरोध शांतिपूर्ण रहेगा और वे किसी तरह की उकसाने वाली कार्रवाई नहीं करेंगे। पीठ ने यह भी कहा कि प्रदर्शन करने का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन प्रदर्शन कानून के दायरे में होना चाहिए। अदालत के अनुसार, विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को पुलिस एक्ट से ऊपर नहीं रखा जा सकता। जस्टिस जॉयमाला बागची ने सुनवाई की शुरुआत में कहा कि अदालत एक असाधारण परिस्थिति में बैठी है। उन्होंने बताया कि सामने दो याचिकाएं हैं, लेकिन कई वकील भी अपनी बात रखना चाहते हैं। अदालत ने कहा कि सभी संबंधित पक्षों को सुनने का अवसर दिया जाएगा। सुनवाई के दौरान कुछ वकीलों ने बारी आने से पहले बोलने की कोशिश की, जिस पर जस्टिस बागची ने नाराजगी जताई। कई वकीलों ने अदालत में नारे भी लगाए। इस व्यवहार पर न्यायाधीशों ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की, जिसके बाद कुछ वरिष्ठ वकीलों ने अन्य वकीलों की ओर से माफी मांगी।
धारा 163 और प्रदर्शनकारियों की हिरासत का मुद्दासुनवाई में दिल्ली में धारा 163 लागू किए जाने का मुद्दा भी उठा। वकील कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि प्रतिबंध लगभग चार किलोमीटर के दायरे में लगाए गए थे और इंटरनेट सेवा पर भी रोक लगी थी। उन्होंने इस मामले में पहले दिए गए इंटरनेट प्रतिबंध संबंधी न्यायिक फैसले का भी उल्लेख किया। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह मांग की गई कि अदालत के बाहर लगाए गए धारा 163 से संबंधित बोर्ड को हटाया जाए। वकीलों ने यह भी आरोप लगाया कि अलग-अलग स्थानों पर लोगों को हिरासत में लिया गया और इस संबंध में वीडियो मौजूद हैं। अदालत ने कहा कि जो याचिकाएं सूचीबद्ध नहीं हैं और केवल तत्काल सुनवाई के लिए पेश की जा रही हैं, उन पर फिलहाल आदेश नहीं दिए जाएंगे। पीठ ने स्पष्ट किया कि वह पहले सूचीबद्ध मामलों की सुनवाई करेगी और संबंधित आवेदनों को बाद में उनके साथ जोड़ा जा सकता है।
अगली सुनवाई पर टिकी नजरेंसुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोगों के जीवन, स्वतंत्रता और अधिकारों से जुड़े सवालों पर वह पूरे मामले की सुनवाई करेगा। जस्टिस बागची ने संबंधित पक्षों को आश्वस्त किया कि अदालत मामले की तह तक जाएगी और सभी दलीलें सुनने के बाद आदेश देगी। अदालत ने दिल्ली पुलिस को अवमानना का नोटिस जारी करते हुए आवाजाही, इंटरनेट सेवा और मेट्रो संचालन सामान्य करने के निर्देश दिए हैं। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने मेट्रो स्टेशनों को खोल दिए जाने और हिरासत में लिए गए कुछ लोगों को उसी दिन रिहा किए जाने की दलील दी। अब मामले में अगली सुनवाई मंगलवार को होनी है।