नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों से स्पष्टीकरण मांगा है कि आखिर क्यों कांवड़ यात्रा मार्ग पर खाद्य विक्रेताओं को अपने बैनरों और स्टॉलों पर क्यूआर कोड स्टिकर अनिवार्य रूप से लगाने का निर्देश जारी किया गया। इस आदेश को लेकर दायर याचिका में इसे निजता के अधिकार और धार्मिक भेदभाव के खिलाफ बताया गया है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ के समक्ष हुई। कोर्ट ने सरकारों को एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है और अगली सुनवाई अगले मंगलवार को निर्धारित की गई है।
क्या है मामला?याचिकाकर्ता शिक्षाविद अपूर्वानंद झा और अन्य ने एक नया आवेदन दाखिल करते हुए आरोप लगाया है कि कांवड़ मार्ग पर दुकानों और भोजनालयों पर क्यूआर कोड लगाने का आदेश असंवैधानिक है। याचिका के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने 25 जून 2025 को जारी प्रेस विज्ञप्ति में यह स्पष्ट किया कि सभी भोजनालयों पर क्यूआर कोड प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा जिससे मालिकों की पहचान और पृष्ठभूमि का पता लगाया जा सकेगा।
याचिकाकर्ता पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने दलील दी कि चूंकि कांवड़ यात्रा दस से बारह दिनों में समाप्त होने वाली है, इसलिए इस मामले को तात्कालिक प्राथमिकता के साथ सुना जाए। उन्होंने कहा कि यह आदेश पूर्वाग्रह और भेदभाव को संस्थागत स्वरूप देता है।
सरकारी पक्ष की मांग: जवाब के लिए दो सप्ताह की मोहलतउत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की ओर से पेश सरकारी वकील जतिंदर कुमार सेठी ने कोर्ट से इस याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा। लेकिन कोर्ट ने स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए केवल एक सप्ताह का समय दिया।
पिछले वर्ष भी इसी प्रकार के आदेश पर लगी थी रोकयह पहला अवसर नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट को इस प्रकार के निर्देशों पर दखल देना पड़ा हो। पिछले वर्ष कोर्ट ने भाजपा-शासित राज्यों – उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्यप्रदेश – द्वारा दिए गए आदेशों पर रोक लगा दी थी, जिसमें भोजनालयों को उनके मालिकों और कर्मचारियों की जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने को कहा गया था। उस समय भी कोर्ट ने इसे धार्मिक प्रोफाइलिंग का प्रयास करार देते हुए सख्त नाराज़गी जताई थी।
क्या कहते हैं याचिकाकर्ता?याचिका में कहा गया है कि यह निर्देश व्यक्तिगत गोपनीयता, संविधान के अनुच्छेद 14 और 21, तथा व्यवसाय की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। जब किसी दुकान पर क्यूआर कोड लगाया जाता है, और वह ग्राहक को मालिक की पहचान तक ले जाता है, तो वह धार्मिक या जातिगत भेदभाव को जन्म देने वाला हो सकता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि इस प्रक्रिया के तहत स्टॉल मालिकों से उनके धार्मिक और जातीय पृष्ठभूमि का खुलासा भी मांगा जा रहा है, जो कि संवैधानिक रूप से अनुचित है।
कांवड़ यात्रा की धार्मिक पृष्ठभूमिश्रावण मास में हजारों श्रद्धालु हरिद्वार, गंगोत्री और अन्य पवित्र स्थलों से गंगा जल लाकर शिवलिंगों का अभिषेक करते हैं। इस दौरान कुछ श्रद्धालु मांसाहार त्यागते हैं और कुछ प्याज और लहसुन तक नहीं खाते। प्रशासन का तर्क यह है कि श्रद्धालुओं को उपयुक्त और पारदर्शी भोजन व्यवस्था मिले, इसके लिए स्टॉल की जानकारी डिजिटल माध्यम से सार्वजनिक करना आवश्यक है।
पर सवाल यह उठता है कि क्या भोजन की शुद्धता सुनिश्चित करने के नाम पर दुकानदारों की पहचान उजागर करना उचित है? क्या यह कानूनन ज़रूरी है या केवल धार्मिक दबावों को संस्थागत रूप देने का प्रयास?
सुप्रीम कोर्ट से फिर टकराया प्रशासनिक आदेशकांवड़ यात्रा के दौरान सुरक्षा और व्यवस्था बनाना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गोपनीयता की कीमत पर नहीं। सुप्रीम कोर्ट के सामने अब यह तय करना है कि QR कोड के माध्यम से व्यापारियों की पहचान उजागर करना न्यायोचित है या नहीं। आने वाले सप्ताह में इस पर महत्वपूर्ण फैसला आ सकता है, जो आने वाले वर्षों के धार्मिक आयोजनों और प्रशासनिक नीतियों की दिशा तय करेगा।