संसद में आज चीन से जुड़े संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा का माहौल बन गया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पूर्व आर्मी चीफ जनरल नरवणे का हवाला देते हुए मोदी सरकार पर सीधे सवाल उठाए। उन्होंने एलएसी पर चीन के टैंकों की स्थिति का जिक्र किया। इस मुद्दे पर हुई तीव्र बहस के कारण लोकसभा का सत्र मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर की प्रतिक्रिया सामने आई है।
राहुल गांधी को बोलने का मौका देना चाहिए थाशशि थरूर ने कहा, मुझे लगता है कि सरकार की ओर से अत्यधिक प्रतिक्रिया दी गई। जबकि जिस मुद्दे को राहुल जी उठाना चाहते थे, वह पहले से ही पब्लिक डोमेन में मौजूद है। वह कारवां मैगजीन में प्रकाशित एक आर्टिकल का हवाला दे रहे थे, जिसमें जनरल नरवणे के एक संस्मरण का जिक्र है, जो अभी तक पूरी तरह से प्रकाशित नहीं हुआ है। ऐसे में सरकार को आपत्ति जताने की बजाय उन्हें बोलने देना चाहिए था।
आर्टिकल सभी के लिए सुलभ हैथरूर ने आगे कहा, वास्तव में यह आर्टिकल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और कोई भी इसे पढ़ सकता है। मेरे विचार में, सरकार की तेज़ प्रतिक्रिया ने आज दोपहर सदन को बेवजह ठप कर दिया। संसद का उद्देश्य ही खुलकर चर्चा करना है। अगर कोई तथ्य गलत हैं, तो उसका सबसे अच्छा समाधान तथ्यों को सही तरीके से पेश करना है, न कि उन्हें रोकना।
सरकार को ज़रूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए थीकांग्रेस सांसद ने कहा, राहुल गांधी को अपनी बात रखने का मौका ही नहीं मिला। आर्टिकल में सेना या सैनिकों पर कोई आरोप नहीं लगाए गए हैं। यह मुद्दा केवल सरकार द्वारा लिए गए या न लिए गए कुछ फैसलों के बारे में है। साफ-साफ कहूँ तो राहुल गांधी सिर्फ यही मुद्दा उठाना चाहते थे। सरकार को इतनी तेज़ प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता नहीं थी।
नेहरू के समय में संसद में खुली बहसें होती थींथरूर ने याद दिलाया, नेहरू जी के समय संसद में इस तरह की बहसें आम थीं। 1962 के चीन युद्ध के दौरान हर दिन संसद में चर्चा होती थी, और कोई व्हिप नहीं था। सरकारी सांसद भी प्रधानमंत्री नेहरू की आलोचना कर सकते थे। 1965 और 1971 के युद्धों में भी संसदीय सत्र चल रहे थे और देश को पूरी जानकारी दी जा रही थी। देशवासियों को भरोसे में रखा जाता था।
ऐसी सरकार क्यों है जो चर्चा से डरती हैराहुल गांधी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए थरूर ने कहा, हमारे पास ऐसी सरकार क्यों है जो चर्चा से डरती है? यह वास्तव में दुख की बात है। मुझे लगता है कि सरकार को बातचीत को बढ़ावा देना चाहिए था, गलतफहमियों को दूर करना चाहिए था, और चीन से जुड़े मामलों पर खुली चर्चा होनी चाहिए थी। यह पूरे देश के लिए चिंता का विषय है।
लोकतंत्र और पारदर्शिता पर प्रभावथरूर ने आगे कहा, विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री को बोलने दें। लोगों को पता होना चाहिए कि क्या हो रहा है। सब कुछ छिपा देने की स्थिति लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। यह संसद के कामकाज और देश की पारदर्शिता दोनों के लिए हानिकारक है। खुली चर्चा ही लोकतंत्र की नींव है।