बिलों पर राज्यपाल की मंजूरी में देरी पर सुप्रीम कोर्ट में मामला टला, केंद्र ने याचिका वापसी का किया विरोध

नई दिल्ली। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार द्वारा राज्यपाल के खिलाफ दायर उस याचिका की सुनवाई को 25 जुलाई तक के लिए स्थगित कर दिया, जिसमें विधानसभा से पारित विधेयकों को मंजूरी देने में देरी को लेकर सवाल उठाया गया था। यह मामला न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति एएस चंदूरकर की खंडपीठ के समक्ष आया, जहां भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने समय मांगा, जिसके चलते सुनवाई टाल दी गई।

केरल की याचिका वापसी की मंशा पर केंद्र ने जताई आपत्ति

सुनवाई के दौरान केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने अदालत को बताया कि वह याचिका वापस लेना चाहते हैं, क्योंकि हाल ही में तमिलनाडु के राज्यपाल को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद यह मुद्दा अब निरर्थक हो गया है। उन्होंने यह भी कहा कि उस फैसले में राज्यपाल द्वारा विधेयकों की मंजूरी में देरी पर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए जा चुके हैं।

हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणि और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर आपत्ति जताई। उन्होंने दलील दी कि इस विषय पर राष्ट्रपति के पास संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत विचाराधीन रेफरेंस लंबित है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को पहले उसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि केरल की यह याचिका भी उस राष्ट्रपति संदर्भ के साथ टैग की जा सकती है।

पीठ की टिप्पणी और वकीलों के बीच तीखी बहस

वेणुगोपाल ने केंद्र के विरोध को अजीब करार देते हुए सवाल किया कि जब राज्य खुद याचिका वापस लेना चाहता है, तो अदालत इसे क्यों रोके? उन्होंने यह भी तंज कसते हुए कहा, “यह तो ऐसा लग रहा है मानो दोनों पक्ष सिर्फ फीस लेने के लिए मुकदमे को लंबा खींचना चाहते हैं।” इस पर न्यायालय की ओर से कहा गया कि प्रारंभिक तौर पर तो याचिका वापसी पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती, हम इसे स्पष्ट कर देंगे।

उल्लेखनीय है कि 8 अप्रैल को तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा विधेयकों की मंजूरी में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम निर्णय दिया था, जिसमें राज्यपाल को समयसीमा में निर्णय लेने का निर्देश दिया गया था। लेकिन अप्रैल 22 को वेंकटरमणि ने कोर्ट को बताया था कि यह फैसला केरल सरकार की याचिका की परिस्थितियों को पूरी तरह कवर नहीं करता। तब अदालत ने यह जांचने की बात कही थी कि क्या तमिलनाडु वाला निर्णय केरल की स्थिति पर भी लागू हो सकता है।

केरल सरकार ने क्यों दाखिल की थी याचिका


केरल सरकार ने यह याचिका राज्यपाल द्वारा विधायिका से पारित कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर निर्णय न लेने के खिलाफ दाखिल की थी। याचिका में दावा किया गया था कि राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 200 के अंतर्गत अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन न करना संविधान का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी वर्ष 2023 में इस देरी को लेकर नाराजगी जता चुका है, जब तत्कालीन राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने दो साल तक कुछ विधेयकों पर कोई फैसला नहीं लिया था।

राज्यपालों द्वारा विधेयकों को मंजूरी देने में हो रही देरी अब केवल राज्यों की शिकायत नहीं रह गई है, बल्कि यह संवैधानिक विमर्श का विषय बन चुका है। जहां एक ओर सुप्रीम कोर्ट राज्यपाल की भूमिका पर सीमाएं तय कर रहा है, वहीं केंद्र सरकार इस विषय को राष्ट्रपति की राय तक ले जाना चाहती है। अब देखना यह होगा कि 25 जुलाई को कोर्ट क्या रुख अपनाता है और क्या यह याचिका राष्ट्रपति रेफरेंस से जोड़ी जाती है या नहीं।