वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मुसलमानों के लिए राहत या नई चुनौती? जानें किन प्रावधानों पर लगी रोक

वक्फ (संशोधन) कानून को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपना अंतरिम निर्णय सुनाया। अदालत ने साफ कहा कि पूरे कानून को रोकने का कोई आधार नहीं है, हालांकि कुछ विवादित धाराओं पर अस्थायी रोक जरूर लगाई गई है। यह फैसला मुस्लिम समाज के लिए आंशिक राहत माना जा रहा है।

कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी, जो शुरुआत से ही इस कानून के खिलाफ मुखर रहे, ने कोर्ट के आदेश को सकारात्मक बताया और कहा कि इससे सरकार की मंशा पर लगाम लगी है। वहीं, मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी फैसले का स्वागत किया लेकिन साथ ही इसे अधूरा करार दिया। सवाल यही उठता है—क्या यह फैसला राहत का पैगाम है या अब भी समुदाय की चिंताएँ बनी रहेंगी?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

चीफ जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की बेंच ने अपने आदेश में कहा कि पूरे संशोधन पर रोक लगाने की कोई वजह नहीं है, मगर कुछ प्रावधान असंवैधानिक प्रतीत होते हैं। इन पर रोक तब तक प्रभावी रहेगी जब तक विस्तृत सुनवाई पूरी नहीं हो जाती।

रुके हुए प्रमुख प्रावधानों में शामिल हैं:

धार्मिक पहचान का प्रावधान: वक्फ बनाने के लिए कम से कम 5 साल तक मुस्लिम होने की शर्त को कोर्ट ने स्थगित कर दिया। अदालत ने माना कि यह प्रावधान अस्पष्ट है और इसकी जांच जरूरी है।

सीईओ की नियुक्ति: कोर्ट ने यह सुझाव दिया कि वक्फ बोर्ड का मुख्य कार्यकारी अधिकारी संभव हो तो मुस्लिम समुदाय से ही होना चाहिए। हालांकि इसे अनिवार्य शर्त नहीं बनाया।

गैर-मुस्लिम सदस्यों की सीमा: बोर्ड में 11 में से अधिकतम 3 गैर-मुस्लिम सदस्य ही रह सकते हैं। वहीं, काउंसिल में 4 गैर-मुस्लिम सदस्य रखने की अनुमति है।

संपत्ति पर कलेक्टर की शक्ति: अदालत ने स्पष्ट किया कि कलेक्टर या कार्यपालिका सीधे तौर पर वक्फ संपत्ति की वैधता तय नहीं कर सकते। अंतिम निर्णय वक्फ ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट पर निर्भर करेगा।

पंजीकरण का मुद्दा: कोर्ट ने वक्फ संपत्तियों के रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता पर रोक नहीं लगाई क्योंकि यह पहले से ही पुराने कानून में मौजूद था।

विरोध और उम्मीदों की कहानी

जब से यह संशोधन कानून आया, देशभर में विरोध के स्वर उठने लगे थे। कई याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि पूरे कानून को खारिज किया जाए। हालांकि अदालत ने इस मांग को खारिज कर दिया और केवल कुछ धाराओं पर ही रोक लगाई। यही वजह है कि मुस्लिम समाज इसे “आंशिक जीत” के तौर पर देख रहा है।

इमरान प्रतापगढ़ी की प्रतिक्रिया

कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने फैसले पर कहा: “यह फैसला समुदाय के लिए राहत की खबर है। सरकार जमीन हथियाने की साजिश कर रही थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर ब्रेक लगा दिया। आस्था को मापने का पैमाना तय करना संभव ही नहीं है। हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।”

मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली का बयान

ईदगाह इमाम और AIMPLB सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा: “हमारी मूल मांग थी कि पूरे अधिनियम पर रोक लगे। हालांकि कोर्ट ने यह कदम नहीं उठाया, फिर भी जिन प्रावधानों पर रोक लगी है, उनका हम स्वागत करते हैं। खासकर सीईओ और कलेक्टर से जुड़े प्रावधानों पर रोक मुस्लिम समाज के हित में है।”

याचिकाकर्ताओं और सरकार के वकीलों की राय

अनस तनवीर (याचिकाकर्ता वकील): उन्होंने कहा कि पहली बार कोर्ट ने माना कि कुछ धाराएँ गलत हैं और उन पर रोक लगाई। यह एक सकारात्मक शुरुआत है।

वरुण सिन्हा (सरकारी पक्ष के वकील): उनका कहना था कि “केंद्र सरकार के संशोधनों पर कोई रोक नहीं लगी है। सिर्फ कुछ प्रावधानों पर अंतरिम आदेश जारी हुआ है। बाकी प्रक्रियाओं को वक्फ ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट की निगरानी में ही लागू किया जाएगा।”