'यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं, छात्रों के भविष्य का सवाल', NEET विवाद पर NDA सहयोगियों में भी बढ़ी बेचैनी

NEET परीक्षा को लेकर देशभर में जारी विवाद और विरोध प्रदर्शनों के बीच राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सहयोगी दलों के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है। सार्वजनिक तौर पर भले ही सहयोगी दल केंद्र सरकार के साथ खड़े नजर आ रहे हों, लेकिन अंदरखाने इस विषय पर गंभीर मंथन चल रहा है। कई नेताओं का मानना है कि इसे केवल राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय छात्रों की आशंकाओं और भविष्य से जुड़े मुद्दे के रूप में लिया जाना चाहिए।

गठबंधन से जुड़े नेताओं का कहना है कि यह मामला केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि लाखों छात्रों और उनके परिवारों के भरोसे से जुड़ा हुआ है। उनका मानना है कि सरकार को ऐसा स्पष्ट संदेश देना होगा कि छात्रों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जा रहा है और उन्हें दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।

NDA नेताओं ने दी सतर्कता बरतने की सलाह

गठबंधन के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से लंबा खिंचने देना ठीक नहीं होगा। उनका मानना है कि यदि सरकार पर दबाव बढ़ता है, तो संसद में किसी भी उपयुक्त नियम के तहत इस विषय पर चर्चा कराने से पीछे नहीं हटना चाहिए। उनका तर्क है कि NEET का मुद्दा सीधे तौर पर छात्रों की भावनाओं से जुड़ा है और ऐसे मामलों में संवाद का रास्ता हमेशा खुला रहना चाहिए।

बिहार से जुड़े NDA के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि गठबंधन की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो संकेत दिए, उनसे यह स्पष्ट होता है कि सरकार परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही पेपर लीक जैसी घटनाओं में शामिल दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का भी भरोसा दिया गया है। हालांकि उन्होंने माना कि सबसे बड़ी चुनौती छात्रों के बीच बनी उस धारणा को बदलना है कि सरकार इस पूरे मामले में पर्याप्त कदम नहीं उठा रही है।
NEET समाप्त करने की मांग ने फिर पकड़ा जोर

इधर, NEET पेपर लीक मामले में सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन जारी है। इसी बीच तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय ने एक बार फिर NEET परीक्षा को समाप्त करने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था की जगह मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश 12वीं बोर्ड परीक्षा के अंकों के आधार पर दिया जाना चाहिए।

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि आने वाले समय में कुछ अन्य राज्य भी इस मांग के समर्थन में खुलकर सामने आ सकते हैं। उल्लेखनीय है कि NEET लागू होने के समय से ही कई राज्यों ने इसका विरोध किया था। विरोध करने वाले राज्यों का तर्क रहा है कि यह परीक्षा कोचिंग संस्थानों पर निर्भरता बढ़ाती है और ग्रामीण क्षेत्रों तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों के लिए मेडिकल शिक्षा तक पहुंच को कठिन बना देती है।

शुरुआत से विवादों में रही है NEET परीक्षा

NEET परीक्षा की शुरुआत वर्ष 2013 में हुई थी। उस समय करीब 5.58 लाख अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी थी। समय के साथ इस परीक्षा का दायरा लगातार बढ़ता गया और इस वर्ष लगभग 19.99 लाख छात्रों ने इसमें भाग लिया। बढ़ती संख्या के साथ परीक्षा की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर भी बहस तेज होती गई है।

पहले जिन राज्यों ने NEET का विरोध किया था, उनमें पश्चिम बंगाल, दिल्ली, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और पंजाब प्रमुख रहे हैं। हालांकि इनमें से कई राज्यों में अब भाजपा या NDA समर्थित सरकारें सत्ता में हैं। इसके बावजूद विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्य इस मुद्दे को लगातार उठाते रहे हैं और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

द्रमुक ने दोहराया अपना पुराना रुख


इस बीच द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) ने भी NEET को समाप्त करने की अपनी पुरानी मांग दोहराई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता टीकेएस एलंगोवन ने कहा कि उनकी पार्टी शुरू से ही केंद्रीकृत मेडिकल प्रवेश परीक्षा का विरोध करती रही है और अब भी उसका मानना है कि मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकारों को अपनी परिस्थितियों और छात्रों की जरूरतों के अनुसार मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया तय करने का अधिकार मिलना चाहिए। द्रमुक का कहना है कि मौजूदा NEET व्यवस्था में बदलाव किए बिना शिक्षा व्यवस्था में समान अवसर सुनिश्चित करना मुश्किल होगा।