सोना-चांदी खरीदना होगा महंगा, सरकार ने कीमती धातुओं पर आयात शुल्क बढ़ाकर 15% किया

देश में सोना और चांदी खरीदने की तैयारी कर रहे लोगों को अब ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। केंद्र सरकार ने कीमती धातुओं के आयात पर लगने वाले शुल्क में बड़ा बदलाव करते हुए इसे बढ़ा दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में लोगों से कुछ समय तक सोना खरीदने से बचने की अपील के बाद मंगलवार को वित्त मंत्रालय ने कई अहम नोटिफिकेशन जारी किए। इन नए आदेशों के तहत सोना, चांदी और अन्य बहुमूल्य धातुओं पर कस्टम ड्यूटी बढ़ा दी गई है। सरकार के मुताबिक नई दरें 13 मई से प्रभावी हो चुकी हैं, जिसके बाद आने वाले दिनों में घरेलू बाजार में सोने-चांदी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। ईरान युद्ध जैसी वैश्विक परिस्थितियों के बीच सरकार यह कदम विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को कम करने के उद्देश्य से उठा रही है।

सोने की कीमतों में तेजी लगभग तय

सरकार द्वारा जारी आदेशों के अनुसार सोने और चांदी पर आयात शुल्क में बड़ा इजाफा किया गया है। पहले जहां कुल आयात शुल्क 6 फीसदी था, अब इसे बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया गया है। वहीं गोल्ड पर लगने वाली बेसिक कस्टम ड्यूटी भी 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत कर दी गई है। माना जा रहा है कि इस फैसले का सीधा असर घरेलू बाजार में सोने की कीमतों पर पड़ेगा और ज्वेलरी खरीदना पहले की तुलना में काफी महंगा हो सकता है।

सरकार का मानना है कि इस कदम से विदेशी खरीद पर नियंत्रण लगेगा और देश से बाहर जाने वाली विदेशी मुद्रा की बचत होगी। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सोना आयात करता है, इसलिए बढ़ते आयात बिल ने लंबे समय से अर्थव्यवस्था और व्यापार घाटे पर दबाव बना रखा है। ऐसे में आयात शुल्क बढ़ाकर सरकार सोने की मांग को सीमित करने की कोशिश कर रही है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में सोने की अहम भूमिका

भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में हर साल औसतन 600 से 800 टन तक सोने की मांग रहती है। वर्ष 2025 में यह मांग लगभग 710.9 टन तक पहुंच गई थी। हालांकि 2026 की पहली तिमाही में मांग घटकर करीब 151 टन रह गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारतीय उपभोक्ता एक साल तक सोने की खरीद कम कर दें या अस्थायी रूप से रोक दें, तो इसका सकारात्मक असर देश की अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।

भारत में सोने का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। ऐसे में आयात कम होने से विदेशी मुद्रा भंडार की बचत होगी, व्यापार घाटा कम होगा और रुपये को मजबूती मिल सकती है। इसके अलावा देश का पैसा विदेशी बाजारों में जाने के बजाय घरेलू निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं में इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे आर्थिक गतिविधियों को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है।

सोना नहीं खरीदने से कितना फायदा हो सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार अगर सोने का आयात घटता है तो अमेरिकी डॉलर की मांग में भी कमी आएगी, जिससे भारतीय रुपये पर दबाव कम हो सकता है। इससे देश की आर्थिक स्थिति को स्थिरता मिल सकती है। आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत हर साल सोने के आयात पर लाखों करोड़ रुपये खर्च करता है। वर्ष 2024-25 में सोने के आयात पर करीब 4.89 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जबकि 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 6.40 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

आंकड़ों के मुताबिक, सोने के आयात में इस तेजी ने भारत के व्यापार घाटे को भी काफी बढ़ाया है। व्यापार घाटा बढ़कर 310.60 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 261.80 अरब डॉलर था। यदि भारतीय नागरिक एक साल तक सोने की खरीद को सीमित कर दें, तो देश को करीब 6.40 लाख करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। इतना ही नहीं, पिछले वर्ष की तुलना में सोने की मांग में लगभग 28.73 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो अनुमान है कि 2026-27 में सोने के आयात पर खर्च बढ़कर 8.23 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।

भारतीयों के पास कितना सोना मौजूद है?

रिपोर्ट्स के मुताबिक भारतीय परिवारों और संस्थानों के पास इतना सोना मौजूद है कि उसकी कुल कीमत दुनिया के कई देशों की सालाना GDP से भी अधिक मानी जाती है। उद्योग संगठन एसोचैम का कहना है कि यदि इस सोने का इस्तेमाल बैंकिंग सिस्टम या बिजनेस सेक्टर में बेहतर तरीके से किया जाए, तो भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास गति कई गुना बढ़ सकती है।

भारत में करीब 75 से 80 प्रतिशत सोना ज्वेलरी के रूप में रखा जाता है। अधिकांश लोग इसे परंपरा, सुरक्षा और लॉन्ग टर्म सेविंग के रूप में देखते हैं। यही वजह है कि लोग आमतौर पर सोना बेचने से बचते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सोने की कीमतों में वृद्धि का असर आम लोगों की रोजमर्रा की खपत पर उतना नहीं पड़ता, क्योंकि इसे निवेश और भविष्य की सुरक्षा के तौर पर ज्यादा देखा जाता है।