अक्टूबर 2025 में अमेरिका के ह्यूस्टन से अपने करियर की पहली समुद्री यात्रा शुरू करने वाली केरल की 24 वर्षीय मरीन इंजीनियर हिफा सलीम ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि नौकरी के कुछ ही महीनों बाद उन्हें युद्ध जैसे हालात का सामना करना पड़ेगा। मर्चेंट नेवी में अपने पहले जहाज पर फिफ्थ इंजीनियर के तौर पर कार्यरत हिफा उस समय फारस की खाड़ी के क्षेत्र में थीं, जब संघर्ष तेज हो गया और समुद्री मार्गों पर सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरा पैदा हो गया।
युद्ध की स्थिति को देखते हुए उनके जहाज का कुवैत जाने का निर्धारित कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। जहाज को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बाहर फुजैरा एंकरेज के पास समुद्र में ही इंतजार करने के निर्देश दिए गए। बाद में उन्हें जानकारी मिली कि यदि जहाज महज 15 घंटे पहले वहां पहुंच जाता, तो वह खाड़ी के भीतर फंस सकता था और हालात कहीं अधिक गंभीर हो सकते थे।
आसमान में मिसाइलें देख कांप उठीं हिफाकेरल के त्रिशूर जिले की रहने वाली हिफा के लिए वह पल जिंदगी का सबसे भयावह अनुभव बन गया, जब उन्होंने पहली बार अपनी आंखों के सामने आसमान में मिसाइलों को उड़ते देखा। इंजन रूम की नियमित जांच से पहले वह कुछ देर ताजी हवा लेने के लिए जहाज के डेक पर पहुंची थीं। तभी उन्होंने देखा कि एक के बाद एक कई मिसाइलें तेज रफ्तार से आसमान को चीरती हुई गुजर रही हैं।
कुछ ही सेकंड का यह दृश्य उनके लिए बेहद डरावना साबित हुआ। हिफा ने बताया कि वास्तविक जीवन में पहली बार मिसाइलें देखकर उनके हाथ कांपने लगे थे। घबराहट इतनी बढ़ गई कि वह तुरंत डेक छोड़कर नीचे क्रू के मेस रूम में पहुंच गईं। उस समय उनके मन में जहाज छोड़कर वापस लौटने का विचार भी आया।
सीनियर अधिकारियों से मिली हिम्मतहालांकि मेस रूम पहुंचने के बाद जो दृश्य उन्होंने देखा, उसने उनका नजरिया बदल दिया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, वहां मौजूद वरिष्ठ अधिकारी सामान्य दिनों की तरह नाश्ता कर रहे थे, बातचीत कर रहे थे और पूरी तरह संयम बनाए हुए थे। उन्हें देखकर हिफा को एहसास हुआ कि कठिन परिस्थितियों में भी जिम्मेदारी निभाना ही एक सच्चे नाविक की पहचान होती है।
उन्होंने कहा कि यदि उनके वरिष्ठ अधिकारी अपने डर को पीछे छोड़कर शांत रह सकते हैं, तो उन्हें भी अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटना चाहिए। इसी दौरान जहाज की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए मुख्य इंजन दोबारा चालू किया गया। रोज सुनाई देने वाली इंजन की 'टक-टक-टक' की आवाज उस दिन उन्हें अलग महसूस हुई। अपनी डायरी में उन्होंने लिखा कि उस क्षण उन्हें ऐसा लगा जैसे जहाज की धड़कन फिर से सुनाई दे रही हो और यह एहसास हो गया कि वे इस मुश्किल घड़ी में अकेले नहीं हैं।
'पांच साब' कहकर बुलाते थे साथीहिफा जहाज पर फिफ्थ इंजीनियर के पद पर तैनात थीं। समुद्री परंपरा के अनुसार उनके साथी क्रू सदस्य उन्हें प्यार से 'पांच साब' कहकर पुकारते थे। तनावपूर्ण माहौल के बीच जहाज के सेकेंड इंजीनियर ने उनके चेहरे पर डर साफ महसूस कर लिया था। हालांकि जब हिफा ने साफ कहा कि वह जहाज छोड़ने के बजाय टीम के साथ रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाना चाहती हैं, तो वरिष्ठ अधिकारी भी उनकी हिम्मत देखकर मुस्कुरा उठे।
सेकेंड इंजीनियर ने उनका उत्साह बढ़ाते हुए कहा, पांच साब अब मजबूत हो गई हैं। आइए, पहले मिलकर एक फ्यूल वाल्व की ओवरहॉलिंग करते हैं, फिर सब ठीक हो जाएगा। इन शब्दों ने हिफा का आत्मविश्वास और मजबूत कर दिया और उन्होंने पूरे साहस के साथ अपनी ड्यूटी जारी रखी।
परिवार ने भी छिपाया अपना डरहिफा ने युद्ध जैसी स्थिति की पूरी जानकारी अपने माता-पिता को नहीं दी, क्योंकि वह नहीं चाहती थीं कि परिवार बेवजह चिंता में डूब जाए। दूसरी ओर, जब जहाज सुरक्षित क्षेत्र में पहुंच गया, तब उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उनके माता-पिता भी हर फोन कॉल पर जानबूझकर सामान्य व्यवहार करते रहे ताकि उनकी बेटी का हौसला बना रहे। दोनों पक्ष एक-दूसरे से अपना डर छिपाकर एक-दूसरे का मनोबल बढ़ाने की कोशिश करते रहे।
त्रिशूर जिले के छोटे से कस्बे एडक्कझियूर की रहने वाली हिफा बचपन से ही कुछ अलग करने का सपना देखती थीं। शुरुआत में उनका लक्ष्य भारतीय नौसेना में जाना था, लेकिन बाद में मर्चेंट नेवी इंजीनियरिंग ने उन्हें अधिक आकर्षित किया। उनके कस्बे में इस क्षेत्र के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी थी। ऐसे में हिफा ने तय किया कि वह अपने इलाके की पहली युवती बनेंगी, जो इस पेशे में कदम रखेगी और आने वाली पीढ़ी के लिए नई राह तैयार करेगी।
गौरतलब है कि समुद्री नाविकों के मामले में भारत दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल है। वर्ष 2024 के आंकड़ों के अनुसार भारत के पास करीब 3.23 लाख नाविक हैं और यह फिलीपींस तथा चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा समुद्री मानव संसाधन वाला देश है। दुनिया में हर पांचवां नाविक भारतीय है। युद्ध के दौरान भारत के ध्वज वाले 13 जहाजों पर सवार करीब 550 भारतीय नाविक 100 दिनों से अधिक समय तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में फंसे रहे थे, जहां उन्हें लगातार तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।