बॉलीवुड अभिनेत्री आलिया भट्ट ने अपनी दमदार एक्टिंग और शानदार स्क्रीन प्रेजेंस से इंडस्ट्री में खास पहचान बनाई है। उनकी स्टाइल और पर्सनालिटी के लाखों-करोड़ों फैंस हैं। प्रोफेशनल लाइफ के साथ-साथ आलिया अपनी निजी जिंदगी में भी कई भूमिकाएं निभा रही हैं—एक पत्नी, एक बेटी और सबसे अहम, एक मां के रूप में। हाल ही में वह अपनी बेटी राहा को लेकर अपनी भावनात्मक चिंताओं के कारण चर्चा में आ गईं। एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव से पैरेंटिंग और बच्चों की परवरिश को लेकर कई गहरे सवाल पूछे, जिनके जवाब काफी विचारशील रहे।
“मैं एक चिंतित मां हूं” — आलिया भट्ट की भावनात्मक स्वीकारोक्तिकार्यक्रम के दौरान आलिया भट्ट ने सद्गुरु से खुलकर अपनी भावनाएं साझा कीं। उन्होंने कहा कि वह अक्सर बेटी राहा को लेकर चिंता में रहती हैं और यह सवाल उनके मन में बार-बार आता है कि क्या वह एक अच्छी मां हैं और क्या वह सही तरीके से अपनी बेटी की परवरिश कर रही हैं।
इस पर सद्गुरु ने बेहद सरल लेकिन गहरा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि जो माता-पिता लगातार चिंता में रहते हैं, वे बच्चों के लिए सबसे बेहतर मार्गदर्शक नहीं बन पाते। उनके अनुसार, बच्चों को “सिखाने” की बजाय उनके सामने एक संतुलित और सकारात्मक उदाहरण पेश करना ज्यादा जरूरी है। बच्चे स्वभाव से ज्यादा खुश और जीवंत होते हैं, इसलिए कई बार वे हमें भी जीवन जीने का तरीका सिखा देते हैं।
बच्चों की खुशी और भविष्य की समझ पर सद्गुरु की सीखजब आलिया ने पूछा कि बच्चों को भविष्य के लिए कैसे तैयार किया जाए, तो सद्गुरु ने एक दिलचस्प सवाल के साथ जवाब दिया—“आप दोनों में ज्यादा खुश कौन है, आप या राहा?” इस पर आलिया ने कहा कि उनकी बेटी ज्यादा खुश रहती है।
सद्गुरु ने समझाया कि बच्चे जीवन के सबसे स्वाभाविक रूप में जीते हैं और बिना किसी कारण के भी खुश रहना जानते हैं। उन्होंने कहा कि माता-पिता अक्सर बच्चों को सही और गलत का पाठ पढ़ाने में लगे रहते हैं, जबकि असली जरूरत उन्हें समझने और उनके स्वभाव को देखने की होती है।
उनके अनुसार, बच्चों को एक सुरक्षित और खुशहाल वातावरण देना सबसे महत्वपूर्ण है, ताकि वे अपनी प्राकृतिक क्षमता के अनुसार विकसित हो सकें। बच्चे केवल सीखने के लिए नहीं होते, बल्कि वे हमें भी जीवन को देखने का नया दृष्टिकोण देते हैं।
हार और जीत को लेकर बच्चों को कैसे समझाएं?आलिया ने यह भी पूछा कि उनकी बेटी राहा हार स्वीकार नहीं कर पाती और अक्सर इसे “चीटिंग” मान लेती है। इस पर सद्गुरु ने कहा कि बच्चों को नैतिकता का कठोर पाठ पढ़ाने के बजाय उन्हें व्यवहार के माध्यम से सीख देना ज्यादा प्रभावी होता है।
उन्होंने सलाह दी कि माता-पिता को बच्चों के साथ खेलते समय हार-जीत को सहजता से लेना चाहिए, ताकि बच्चे खुद ही इस संतुलन को समझ सकें। जब बच्चे देखते हैं कि हार भी जीवन का हिस्सा है, तो वे इसे स्वीकार करना सीख जाते हैं।
बच्चों की जिज्ञासा और सवालों का जवाब कैसे दें?सद्गुरु ने बच्चों की जिज्ञासा पर भी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि जब बच्चे सवाल पूछें, तो हमेशा तथ्यात्मक उत्तर देने की बजाय उनकी जिज्ञासा को बनाए रखना चाहिए। अगर किसी सवाल का जवाब न पता हो, तो ईमानदारी से यह कहना बेहतर है कि “मुझे नहीं पता”, और फिर साथ मिलकर उसका जवाब ढूंढना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में जानकारी की अहमियत कम हो सकती है क्योंकि तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कई चीजें संभाल लेंगे। ऐसे में बच्चों की असली ताकत उनकी चेतना, रचनात्मकता और खुशी होगी, जिसे विकसित करना जरूरी है।
अच्छी पैरेंटिंग का असली मतलब क्या है?सद्गुरु ने पैरेंटिंग को लेकर सबसे अहम बात कही कि “पैरेंटिंग” शब्द को ही बोझ की तरह नहीं लेना चाहिए। उनके अनुसार, माता-पिता को बच्चों का दोस्त और मार्गदर्शक बनना चाहिए, न कि नियंत्रक।
उन्होंने समझाया कि जब कोई खुद को केवल “माता-पिता” के रोल में सीमित कर लेता है, तो अनजाने में वह सख्त या नियंत्रक बन सकता है। असल में, पैरेंटिंग कोई परफेक्शन की दौड़ नहीं है, बल्कि यह एक साथ बढ़ने और सीखने की प्रक्रिया है। अगर व्यक्ति खुद को बेहतर इंसान बनाने पर ध्यान देता है, तो वह स्वाभाविक रूप से बेहतर माता-पिता भी बन जाता है।