समंदर की लहरों में जो शांति और खूबसूरती है, वो हमारे दिल और दिमाग को तरोताजा कर देती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सागर किनारे बहती हवा में हमारे फेफड़ों की सुरक्षा छिपी होती है? सच कहें तो जहां समंदर है, वहां की हवा हमेशा साफ होती है। साफ हवा जहां मिलती है, वहां सांस लेना आसान होता है और जीवन भी बेहतर महसूस होता है।
कोस्टल एरियाज में रहने वाले लोग महानगरों की तुलना में ज्यादा स्वस्थ फेफड़े रखते हैं। उनकी सांसों में प्रदूषण कम होता है और उनके लंग्स पर पॉल्यूशन का दबाव भी कम पड़ता है। लेकिन ऐसा क्यों होता है? इसका जवाब वैज्ञानिक रूप से भी मौजूद है।
कैसे समुद्र किनारे हवा होती है साफसमुद्र की सतह ठंडी रहती है, जो अपने आसपास की गर्म और प्रदूषित हवा को ठंडा और शुद्ध करके वापस भेजती है। समुद्री पानी एक प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करता है और PM 2.5 जैसे खतरनाक कणों को सोख लेता है। यही वजह है कि कोस्टल एरिया का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) इनलैंड शहरों की तुलना में हमेशा बेहतर रहता है।
समुद्र की हवा में मौजूद नमक, आयोडीन और नेगेटिव आयन्स फेफड़ों को मजबूत बनाते हैं। इसका असर यह होता है कि कोस्टल इलाकों में रहने वालों में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और अन्य लंग्स की बीमारियां कम देखी जाती हैं। वहीं, महानगरों में हाई PM2.5 और NO2 के कारण लंग्स की क्षमता धीरे-धीरे घटती है।
समुद्र: धरती का नेचुरल एयर प्यूरीफायरमहासागर दुनिया का सबसे बड़ा ‘कार्बन सिंक’ भी है। इंसानों द्वारा छोड़ी गई कुल कार्बन डाइऑक्साइड का करीब 30% हिस्सा अकेले महासागर सोख लेता है। यानी महासागर हमारी पृथ्वी का प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर भी है।
लेकिन आज महासागर का अस्तित्व खतरे में है। इसका मुख्य कारण है माइक्रो-प्लास्टिक। नई रिसर्च के अनुसार माइक्रो-प्लास्टिक महासागर की कार्बन सोखने की क्षमता को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है। जो समंदर कभी साफ और ताजी हवा देता था, वही अब इंसानी गतिविधियों के कारण प्रदूषित हो रहा है।
यदि हम सोचते हैं कि प्लास्टिक की एक बोतल, थैली या स्ट्रॉ फेंकना कोई बड़ी बात नहीं, तो यह गलत है। हर छोटी चीज मिलकर समुद्र में विशाल कचरे का पहाड़ बना रही है। अगर इसे रोक नहीं गया, तो धरती और महासागर दोनों पर इसका विनाशकारी असर होगा।
इसलिए हमारी जिम्मेदारी है कि हम प्लास्टिक का उपयोग कम करें और महासागर की रक्षा करें। ताकि आने वाली पीढ़ियां साफ हवा में खुलकर जी सकें और समुद्र अपनी नेचुरल एयर प्यूरीफायर की भूमिका निभा सके।