आज की ज़िंदगी रेस की तरह हो चुकी है। कोई करियर के पीछे दौड़ रहा है, कोई पैसों के पीछे, तो कोई समय को पकड़ने की कोशिश में खुद को ही खो बैठा है। लेकिन इस दौड़ में एक चीज़ हमसे कहीं तेज़ भाग रही है—बीमारी। हम हेल्थ इंश्योरेंस लेते हैं, बड़े अस्पताल तलाशते हैं, महंगी दवाओं के खर्च का हिसाब लगाते हैं और रिपोर्ट्स में नंबर ढूंढते रहते हैं। हर कोशिश इस बात की होती है कि बीमारी से कैसे जीता जाए। पर एक सवाल अक्सर अनसुना रह जाता है—क्या हम बीमारी को आने से पहले रोक पा रहे हैं?
सच यही है कि सेहत किसी मशीन, दवा या रिपोर्ट में कैद नहीं है। असली सेहत हवा में घुली हुई है, धूप की गर्माहट में है और उस गहरी सांस में है जो हम खुलकर लेते हैं। जब इलाज शुरू होता है, तब तक शरीर काफी नुकसान झेल चुका होता है। लेकिन अगर जीवनशैली संतुलित हो, तो बीमारी खुद रास्ता बदल लेती है। यही वजह है कि आज चर्चा उस सेहत की है जो अस्पतालों में नहीं, बल्कि सुबह की वॉक, हरियाली, और सुकून भरी सांसों में छुपी है।
कैंसर से बचाव की जापानी सोच: ‘फॉरेस्ट बाथिंग’जंगल, पेड़-पौधे, खुला आसमान—ये सिर्फ नज़ारे नहीं, बल्कि प्राकृतिक औषधि हैं। जापान में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचाव के लिए जिस तरीके को अपनाया जाता है, उसे ‘फॉरेस्ट बाथिंग’ कहा जाता है। वहां इसे ‘शिनरिन-यो’ के नाम से जाना जाता है।
यह कोई एक्सरसाइज या योगासन नहीं, बल्कि प्रकृति को अपनी पांचों इंद्रियों से महसूस करने की कला है।
इस प्रक्रिया में आंखें हरे पत्तों और सूरज की रोशनी को देखती हैं, नाक पेड़ों से निकलने वाले प्राकृतिक तत्वों को महसूस करती है, कान पक्षियों की चहचहाहट और हवा की सरसराहट सुनते हैं, हाथ मिट्टी और पेड़ों को छूते हैं और फेफड़े शुद्ध हवा से भर जाते हैं।
यही प्राकृतिक अनुभव शरीर में मौजूद ‘नेचुरल किलर सेल्स’ को सक्रिय करता है, जो शुरुआती स्तर पर ही कैंसर कोशिकाओं और वायरस को नष्ट करने में मदद करते हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि सिर्फ एक दिन हरे-भरे जंगल में बिताने से इम्यून सिस्टम कई हफ्तों तक मजबूत बना रहता है। यही कारण है कि जापान के उन इलाकों में, जहां लोग नियमित रूप से प्रकृति के बीच समय बिताते हैं, वहां फेफड़े, स्तन और प्रोस्टेट कैंसर से होने वाली मौतों का आंकड़ा कम देखा गया है।
क्यों बढ़ता जा रहा है कैंसर का खतरा?आज की सबसे खतरनाक बीमारी कोई वायरस नहीं, बल्कि ‘टेक्नो स्ट्रेस’ है। लगातार मोबाइल स्क्रीन, लैपटॉप, शोर और तेज़ रफ्तार जीवन ने इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर दिया है। ऐसे में जंगल की शांति इस शोरगुल से बाहर निकलने का सबसे आसान और सस्ता उपाय बन जाती है। दवा की ज़रूरत तब पड़ती है जब बीमारी आ चुकी होती है, लेकिन अगर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में थोड़ी हरियाली, थोड़ी खुली हवा और थोड़ा सुकून शामिल हो जाए, तो शायद दवाओं की नौबत ही न आए।
कितना खतरनाक है कैंसर?अगर कैंसर की पहचान सही समय पर हो जाए, तो जान बचाने की संभावना काफी बढ़ जाती है। शुरुआती स्टेज में इलाज के नतीजे बेहतर होते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि करीब 70% मामलों में कैंसर आखिरी स्टेज में पता चलता है। हर 9 में से एक व्यक्ति पर कैंसर का खतरा बना हुआ है। ऑक्सफोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 40% महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर की चपेट में हैं। बीते 10 वर्षों में मौतों की दर में थोड़ी कमी ज़रूर आई है, लेकिन कैंसर का फैलाव लगातार बढ़ रहा है। फिलहाल सर्वाइवल रेट करीब 70% तक पहुंचा है।
कैंसर के प्रमुख जोखिम कारक
मोटापा
धूम्रपान
शराब का सेवन
प्रदूषण
पेस्टिसाइड का संपर्क
अधिक धूप में रहना (सनबर्न)
बचाव ही असली इलाज: किन चीज़ों से बनाएं दूरी?
प्रोसेस्ड फूड
अत्यधिक तली-भुनी चीज़ें
रेड मीट
कार्बोनेटेड ड्रिंक्स
कैंसर से बचाव में सहायक प्राकृतिक तत्व
व्हीटग्रास
गिलोय
एलोवेरा
नीम
तुलसी
हल्दी