होली के सिंथेटिक रंग बन सकते हैं सेहत के लिए खतरनाक, आंखों और फेफड़ों को हो सकता है नुकसान, जानें बचाव के उपाय

होली का त्योहार इस वर्ष 3 और 4 मार्च को मनाया जा रहा है। देशभर में रंग, गुलाल और पानी की फुहारों के साथ उत्सव का माहौल रहेगा। लेकिन जहां एक ओर रंगों की चमक और उत्साह दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर बाजार में बिकने वाले कई कृत्रिम (सिंथेटिक) रंग स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी भी साबित हो सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि कई सस्ते और आकर्षक दिखने वाले होली के रंगों में औद्योगिक रसायन, भारी धातुएं और हानिकारक डाई मिलाई जाती हैं। ये तत्व शरीर के संपर्क में आकर त्वचा संबंधी परेशानियों से लेकर आंखों और श्वसन तंत्र की गंभीर समस्याओं तक का कारण बन सकते हैं। खासकर जिन लोगों को अस्थमा, एलर्जी या संवेदनशील त्वचा की समस्या है, उनके लिए जोखिम और अधिक बढ़ जाता है।

त्वचा पर सिंथेटिक रंगों का दुष्प्रभाव

बाजार में मिलने वाले कई रंगों में सीसा (Lead), पारा (Mercury), क्रोमियम और सिलिका जैसे हानिकारक तत्व पाए जा सकते हैं। ये रसायन त्वचा की ऊपरी परत को नुकसान पहुंचाकर जलन, खुजली, लाल चकत्ते और कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं।

जिन लोगों को पहले से एक्जिमा, सोरायसिस या अन्य त्वचा रोग हैं, उनमें रिएक्शन ज्यादा गंभीर हो सकता है। बार-बार ऐसे रंगों के संपर्क में आने से त्वचा शुष्क और अधिक संवेदनशील बन सकती है। कुछ मामलों में रंगों के कारण दाग-धब्बे या लंबे समय तक रहने वाले निशान भी देखे गए हैं।

आंखों के लिए कितना खतरनाक है यह जोखिम?

होली के दौरान रंगों का आंखों में चले जाना आम बात है, लेकिन इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। रासायनिक तत्वों से युक्त रंग आंखों में जलन, सूजन और तेज लालिमा पैदा कर सकते हैं। कई बार कंजंक्टिवाइटिस (आंख आना) या कॉर्निया पर खरोंच (कॉर्नियल एब्रेशन) की शिकायत सामने आती है।

रंगों में मौजूद अम्लीय या क्षारीय पदार्थ आंखों की नाजुक परत को नुकसान पहुंचा सकते हैं। समय पर इलाज न मिलने पर संक्रमण फैल सकता है और दृष्टि पर भी असर पड़ सकता है। जो लोग कॉन्टैक्ट लेंस पहनते हैं, उनके लिए खतरा और ज्यादा होता है, क्योंकि पाउडर लेंस के पीछे फंसकर आंखों में गंभीर इंफेक्शन पैदा कर सकता है। इसलिए विशेषज्ञ होली के दिन लेंस से परहेज करने की सलाह देते हैं।
फेफड़ों और सांस पर पड़ने वाला प्रभाव

सूखे रंग, खासकर लाल और गुलाबी पाउडर, हवा में तेजी से फैलते हैं और सांस के जरिए शरीर के भीतर पहुंच जाते हैं। कई बार इनमें कीटनाशक, एस्बेस्टस या भारी धातुओं के अंश भी मौजूद होते हैं। इन्हें सांस के साथ अंदर लेने पर अस्थमा का दौरा, ब्रोंकाइटिस, राइनाइटिस, घरघराहट और सीने में जकड़न जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

लगातार संपर्क से श्वसन तंत्र में सूजन आ सकती है और लंबे समय में क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) का खतरा बढ़ सकता है। अस्थमा या एलर्जी से ग्रस्त लोगों को विशेष रूप से सूखे रंगों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है।

यदि रंग गलती से निगल लिया जाए या अधिक मात्रा में शरीर में प्रवेश कर जाए, तो यह लीवर और किडनी पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। कुछ इंडस्ट्रियल डाई के लंबे समय तक संपर्क में रहने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का जोखिम भी बताया जाता है। गर्भवती महिलाओं को ऐसे रंगों से खास सावधानी बरतनी चाहिए।

सुरक्षित और जिम्मेदार तरीके से होली कैसे खेलें?

त्योहार की खुशी को बरकरार रखते हुए सेहत का ख्याल रखना बेहद जरूरी है। कुछ सरल सावधानियां अपनाकर जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है:

- हमेशा प्राकृतिक या हर्बल गुलाल का चयन करें।

- होली खेलने से पहले त्वचा और बालों पर नारियल तेल या मॉइश्चराइजर लगाएं, ताकि रंग सीधे त्वचा में न समाए।

- पूरी बाजू के कपड़े पहनें और आंखों की सुरक्षा का ध्यान रखें।

- कॉन्टैक्ट लेंस की जगह चश्मा पहनना बेहतर विकल्प है।

- रंग लगने के बाद जल्द से जल्द साफ पानी से धो लें और त्वचा को रगड़ने से बचें।

- अत्यधिक धूल या भीड़-भाड़ वाली जगहों पर खेलने से परहेज करें।