लम्बे समय से प्रदर्शन की बाट जोह रही निर्माता दिनेश विजान की लक्ष्मण उतेकर निर्देशित, विक्की कौशल अभिनीत छावा आज वैलेंटाइन डे पर दर्शकों के सामने आई है। फिल्म के ट्रेलर और टीजर ने इस बात का संकेत दिया था कि इस बार दिनेश विजान पीरियड ड्रामा फिल्म को भव्य तरीके से परदे पर उतारने जा रहे हैं। उन्होंने फिल्म को संजय लीला भंसाली की तरह भव्य बनाने के पीछे बहुत पैसा बहाया है लेकिन वो बात नहीं आ पाई है, जो भंसाली की फिल्मों में नजर आती है। हालांकि फिल्म दर्शकों को अपने साथ बांधने में कामयाब होती है लेकिन कुछेक ऐसे पक्ष हैं जहाँ वह कमतर हो जाती है। तेज भागती ये कहानी शुरू से अंत तक बांधे रखती है।
'छावा' छत्रपति संभाजी महाराज की अनसुनी कहानी है। फिल्म में संभाजी के किरदार को विक्की कौशल ने निभाया है। वीर मराठा योद्धा के साहस, संघर्ष और विरासत को दर्शाने में ये फिल्म पूरी तरह कामयाब हुई है। फिल्म में विक्की कौशल को महारानी येसुबाई के रूप में रश्मिका मंदाना का साथ मिला है। खतरनाक औरंगजेब के रूप में अक्षय खन्ना कहानी को और बल दे रहे हैं।
कैसी है कहानी कहानी जनवरी 1681 के दौर से शुरू होती है, जहां मुगल बादशाह औरंगजेब को मराठा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन की खबर मिलती है। ये खबर मिलते ही औरंगजेब राहत की सांस लेता है। औरंगजेब को लगता है कि अब वो आराम से डेकन के मराठा साम्राज्य पर कब्जा कर लेगा। इस दौरान औरंगजेब को छत्रपति संभाजी महाराज उर्फ छावा की शक्ति का अहसास नहीं होता। इसी बीच छावा बुरहानपुर पर हमला करते हैं और मुग़लों को हरा देते हैं। उस दौर में बुरहानपुर, मुगलों का सबसे कीमती शहर था। इस जीत का जश्न मनाते हुए छावा, औरंगजेब को डेकन पर अपनी शैतानी नजर न डालने की चेतावनी देते हैं।
इस हार के बाद औरंगजेब तिलमिला उठता है और गुस्से में मराठा साम्राज्य को खत्म कर मुग़ल साम्राज्य स्थापित करने की कसम खाता है। वो छत्रपति संभाजी महाराज को पकड़ने का भी प्रण लेता है। दूसरी ओर छत्रपति संभाजी महाराज भी औरंगजेब की विशाल सेना से निपटने और उसे हराने के लिए अपनी सेना के साथ रणनीति बनाते हैं। इसी के साथ कहानी में कई दिलचस्प मोड़ आते हैं। फिल्म में येसुबाई के साथ छावा की बॉन्ड और इमोशनल पल भी दिखाए गए हैं।
निर्देशननिर्देशक लक्ष्मण उतेकर ने दर्शकों को 'मिमी', 'लुका छुपी' और 'जरा हटके जरा बचके' जैसी सामाजिक सरोकार वाली फिल्में दी हैं। हल्की फुल्की कॉमेडी के साथ सामाजिक मुद्दे उठाने वाले लक्ष्मण उतेकर ने इस बार बिल्कुल ही अलग जॉनर चुना। फिक्शन को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने ऐतिहासिक कहानी को तवज्जो दी। इस असल कहानी को दिखाने में उन्हें फुल मार्क्स मिलते हैं। एक महान राजा की कहानी कहने के लिए निर्देशक तारीफ के हक़दार हैं। बहादुरी और वीरता जैसे इमोशंस को दिखाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। निर्देशक के विज़न की बदौलत ही पहले ही फ्रेम से दर्शक कहानी से जुड़ेंगे। कई धमाकेदार क्षणों के साथ फिल्म को गतिशील, आकर्षक और मनोरंजक बनाया गया है।
छायांकन (सिनेमेटोग्राफी)फिल्म का छायांकन सौरभ गोस्वामी ने संभाला है। उन्होंने दृश्यों को कैमरे के एंगलों से भव्य बनाने का पूरा प्रयास किया है। विशेष रूप से फिल्म का शुरूआती युद्ध दृश्य, जिसे देखते हुए भंसाली की पद्मावत और बाजीराव मस्तानी का ध्यान आता है। युद्ध दृश्यों के साथ-साथ कैमरा मैन ने मुख्य अदाकारों के भावनात्मक दृश्यों को भी बड़ी सहजता के साथ परदे पर पेश किया है।
गीत-संगीतए.आर रहमान ने फिल्म का संगीत तैयार किया है, लेकिन फिल्म में एक भी ऐसा गीत नहीं है जिसे फिल्म देखने के बाद गुनगुनाया जा सके। इस मामले में ए.आर. रहमान पीछे रह गए हैं। इसमें केवल रहमान का दोष नहीं है, अपितु गीतकार इरशाह कामिल और क्षितिज पटवर्धन उनके संगीत के लिहाज से गीतों के बोल लिखने में असमर्थ रहे हैं। बैकग्राउण्ड म्यूजिक फिल्म में आने वाले हर मोड़ पर सटीक बैठता है और कहानी को संतुलित रखता है।
एडिटिंगगीत संगीत के बाद फिल्म की दूसरी सबसे बड़ी कमजोरी इसका सम्पादन (एडिटिंग) है। फिल्म में कई जगह ऐसे कट हैं जिसकी उम्मीद नहीं की जा सकती। इसके साथ ही युद्ध के दृश्यों में कई कमियां नजर आती हैं। एक दृश्य में साफ पता चलता है कि तलवार शरीर के अंदर न जाकर साइड से निकल गई है। इसके चलते फिल्म अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाती है। जिस प्रवाह से कहानी आगे बढ़ती है, उसमें रुकावट आ जाती है। लेकिन इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं कि फिल्म बोझिल करती है।
अभिनय विक्की कौशल ने फिल्म दर फिल्म अपने अभिनय में परिपक्वता प्राप्त की है। उन्होंने अपने अभिनय से छत्रपति संभाजी महाराज को जीवंत किया है। हालांकि उनकी संवाद अदायगी इस मामले में कमजोर रही है। एक देशप्रेमी और ऊर्जावान राजा के रूप में जिस तरह से संवादों को बोला जाना चाहिए थे, उसमें विक्की कमजोर साबित हुए हैं। संवाद लेखक ऋषि विरमानी और इरशाद कामिल इस मामले में कमजोर साबित हुए हैं। येसुबाई के रूप में रश्मिका खूबसूरत लगी हैं। फिल्म में उनकी मौजूदगी हल्के हवा के झोके की तरह है। रश्मिका मंदाना की डायलॉग डिलीवरी में उनका साउथ का टच कई जगह बना रहता है। हाथ से दीया बुझाना हमें बाजीराव मस्तानी की याद दिला देता है, लेकिन वैसा असर नहीं होता है।
अदाकारों में सबसे ज्यादा दर्शकों को प्रभावित करने में सफल हुए हैं अक्षय खन्ना। क्रूर औरंगजेब के रूप में अक्षय खन्ना बेहद शानदार हैं। अक्षय खन्ना ने इस किरदार में जान फूंक दी है। शायद ही उनसे बेहतर इस किरदार में कोई और अदाकार लगता। लेकिन कैमरा का एंगल ऐसा रहता है कि उनका माथा और सुरमयी आखें ही दिखती हैं। आशुतोष राणा, दिव्या दत्ता, विनीत कुमार सिंह और डायना पेंटी भी स्पोर्टिंग रोल में परफेक्ट सिलेक्शन रहे हैं।
निष्कर्षपीरियड ड्रामा फिल्म के लिहाज से 'छावा' एक बेहतरीन फिल्म है। इसकी भव्यता को देखने के लिए इसे सिनेमाघरों में ही देखा जा सकता है। छोटे परदे पर यह फिल्म अपना असर नहीं छोड़ पाएगी। समझने के लिए इसे सिनेमाघरों में जरूर देख सकते हैं। फिल्म में हुई हल्की फुल्की चूक को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।