कोरोना वायरस महामारी को रोकने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन 3.0 के दौरान ग्रीन जोन्स में काफी छूट दी गई है। देश के कुल जिलों में से 43% से ज्यादा ग्रीन जोन्स में हैं जहां लोगों के आने-जाने और काम करने पर लगी रोक एक तरह से हट गई है। सोशल डिस्टेंसिंग के पालन की शर्तों के साथ ग्रीन जोन्स में दुकानें, बाजार, दफ्तर, ऑटो, टैक्सी, बस, कारोबारी और औद्योगिक गतिविधियों को इजाजत दी जा चुकी है। इन जगहों पर लोग अब एक जगह से दूसरे जगह आसानी से जा रहे हैं। धीरे-धीरे फिर से काम-धंधा शुरू कर चुके हैं।
कह सकते हैं कि 43% देश अब कोरोना संकट के बीच सामान्य जनजीवन की तरफ बढ़ चला है। तो क्या ग्रीन जोन्स में हर्ड इम्यूनिटी का टेस्ट भी शुरू हो चुका है, जिसे तमाम विशेषज्ञ कोरोना के खिलाफ 'प्लान बी' बता रहे हैं? इसका जवाब है- हां, कुछ हद तक।
दरअसल, जब तक कोरोना वायरस की वैक्सीन नहीं बन जाती तब तक खतरा बहुत ही ज्यादा है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब तक वैक्सीन नहीं बन जाती लॉकडाउन जारी रहे? बिल्कुल नहीं, क्योंकि तब बीमारी से ज्यादा लोग इसे रोकने की इस कवायद से मरने लगेंगे। इकॉनमी चौपट हो जाएगी, अभूतपूर्व बेरोजगारी बढ़ जाएगी। हो सकता है कि लोगों के भूखों मरने की नौबत तक आ जाए।
ऐसी सूरत में वैक्सीन बनने तक 'हर्ड इम्यूनिटी (Herd Immunity)' के कॉन्सेप्ट से लोगों की उम्मीदें बढ़ी हैं। इसी को प्लान बी के तौर पर बताया जा रहा है कि लोगों को खुला छोड़ दें संक्रमण के लिए, इससे 'हर्ड इम्यूनिटी' विकसित होगी और आखिरकार महामारी खत्म हो जाएगी। लेकिन इसमें इतना ज्यादा जोखिम है कि दुनिया भर के विशेषज्ञ इसे लेकर बंट चुके हैं। ऐसे में हम आपको बताते है कि आखिर क्या है 'हर्ड इम्यूनिटी (Herd Immunity)'?
जब बहुत सारे लोग किसी संक्रामक बीमारी के प्रति इम्यून (Immune) हो जाते हैं यानी उनमें उसके प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है तो वह बीमारी बाकी बचे असंक्रमित लोगों को अपनी चपेट में नहीं ले पाती है क्योंकि पूरा समूह ही इम्यून हो चुका होता है। इसी को हर्ड इम्यूनिटी कहते हैं। यह प्रतिरोधक क्षमता या तो वैक्सीन के जरिए मिलेगी या फिर बड़ी तादाद में लोगों के संक्रमित होने और उनके भीतर संबंधित बीमारी के प्रति इम्यूनिटी विकसित होने से होगी। उदाहरण के तौर पर न्यूमोनिया और मेनिन्जाइटिस जैसी बीमारियों की वैक्सीन देकर बच्चों को इसके प्रति इम्यून बनाने का नतीजा यह हुआ कि वयस्क लोगों के इन बीमारियों की चपेट में आने की गुंजाइश बहुत कम हो गई। अगर कुछ लोगों में ही किसी बीमारी के प्रति इम्यूनिटी है तो वह संक्रामक बीमारी आसानी से फैलती है। अगर ज्यादातर लोगों में वैक्सीन या एक्सपोजर की वजह से इम्यूनिटी आ जाए तो वायरस का फैलना रुक जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कोविड-19 (Covid-19) की बात करें तो अगर 60 से 85% आबादी में इसके प्रति इम्यूनिटी आ जाए तो इसे हर्ड इम्यूनिटी करेंगे। डिप्थीरिया में यह आंकड़ा 75%, पोलियो में 80 से 85% और मीजल्स में 95% है।
आदर्श स्थिति में हर्ड इम्यूनिटी का टेस्ट तब कहा जा सकता है जब रेड जोन्स में भी लोग कोरोना के खतरे के बावजूद पहले की तरह अपनी सामान्य गतिविधियों को चलाते। इस तरह से लोग बड़ी तादाद में कोरोना से संक्रमित होते और आखिरकार उनमें इसके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती। ग्रीन जोन्स में संक्रमण का जोखिम बहुत ही कम है, इसलिए वहां पूरी तरह से सामान्य जनजीवन को भी हर्ड इम्यूनिटी का कुछ हद तक ही टेस्ट कह सकते हैं। फिलहाल देश में रेड जोन में 130 जिले हैं, ऑरेंज जोन में 284 जिले और ग्रीन जोन में 319 जिलों को रखा गया है।














