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तेज आवाज और शोर-शराबे से भय का मतलब अकूस्टिकोफ़ोबिया, ऐसे पाएं निजात

अकूस्टिकोफ़ोबिया यानी तेज़ आवाज़ व शोर-शराबे से भय। इस बीमारी के बारे में बात करते हुए मुंबई की साइकियाट्रिस्ट काउंसलर ...

Posts by : Nupur Rawat | Updated on: Fri, 28 May 2021 3:11:00

तेज आवाज और शोर-शराबे से भय का मतलब अकूस्टिकोफ़ोबिया, ऐसे पाएं निजात

अकूस्टिकोफ़ोबिया यानी तेज़ आवाज़ व शोर-शराबे से भय। इस बीमारी के बारे में बात करते हुए मुंबई की साइकियाट्रिस्ट काउंसलर डॉ. रुख़साना अयाज़ कहती हैं,‘‘इस बीमारी से पीड़ित लोग तेज़ आवाज़ या शोरगुल सुनकर डर जाते हैं।’’ डॉ. अयाज़ ने बताया कि भारत में बहुत कम लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं।


तेज आवाज और शोर-शराबे से भय का मतलब अकूस्टिकोफ़ोबिया, ऐसे पाएं निजात

क्या हैं इसके लक्षण?
इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति तेज़ आवाज़ सुनकर डर जाता है, वो कांपने लगता है और उसके पसीने छूटने लगते हैं। कुछ केसेज़ में मरीज़ को मिचली आना, दिल की धड़कन बढ़ना, सांस फूलना, मुंह सूखना या ऐंग्ज़ाइटी अटैक की भी शिकायत होती है।


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कैसे होती है इसकी शुरुआत?

जो लोग ज़्यादा तनावग्रस्त व चिंतित रहते हैं, उन्हें यह बीमारी होने का ख़तरा अधिक होता है। इस बारे में विस्तार से बताते हुए डॉ. अयाज़ कहती हैं,‘‘किसी भी फ़ोबिया के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। यह किसी विशेष घटना, बचपन की बुरी यादों इत्यादि से जुड़ा हो सकता है। परिवार का इतिहास और पालन-पोषण भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं।’’

अगर आप ऐसे माहौल में पले-बढ़े हैं, जहां हर कोई तेज़ आवाज़ को नापसंद करता है, ऐसे में आपका शोरगुल सुनकर परेशान होना, आम है। दुर्घटना का सामना इसका अन्य प्रमुख कारण है। अगर आप किसी ऐसी दुर्घटना की शिकार हुई हों या कोई ऐसी दुर्घटना देखी हो, जो शोरगुल या तेज़ आवाज़ के कारण घटित हुई हो तो आवाज़ के प्रति मन में भय बैठ जाना स्वाभाविक है। जिन लोगों को सुनने में परेशानी होती है, उन्हें भी यह बीमारी हो सकती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि तेज़ आवाज़ के कारण वे बहरे हो सकते हैं।


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निजात पाने का तरीक़ा

डॉ. अयाज़ कहती हैं,‘‘इस बीमारी के इलाज के लिए पहले मरीज़ को शांत करना ज़रूरी है। ट्रीटमेंट की शुरुआत तनाव को कम करने वाली दवाइयां देकर की जाती हैं। हालांकि दवाइयां हमेशा नहीं लेनी पड़तीं, लेकिन शुरुआत में दवाइयां खानी पड़ती हैं। उसके बाद सिस्टमैटिक डिसेन्सिटाइजेशन ट्रीटमेंट किया जाता है।

इसके तहत मरीज़ को पहले हल्की आवाज़ और फिर धीरे-धीरे तेज़ आवाज़ सुनाई जाती है, ताकि उनके मन से आवाज़ का डर निकल जाए। मरीज़ को बिहेवियरल साइकोथेरैपी सेशन्स भी दिए जाते हैं, जिसके अंतर्गत डॉक्टर मरीज़ के डर का कारण जानकर उसे दूर करने की कोशिश करता है।’’

‘‘हमारे देश में ज़्यादातर समारोहों व उत्सवों की शुरुआत पटाखे छुड़ाकर की जाती है इसलिए बहुत कम लोग अकूस्टिकोफ़ोबिया से ग्रसित होते हैं, क्योंकि लोग आवाज़ को त्यौहार और शादी से जोड़कर देखते हैं। लोगों को मालूम होता है कि यह रस्म है इसलिए वे हंसी-ख़ुशी आवाज़ का आनंद उठाते हैं,’’ कहती हैं डॉ. अयाज़।

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