रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को लेकर अमेरिका ने एक और बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने से जुड़े एक महत्वपूर्ण विधेयक को भारी बहुमत के साथ मंजूरी दे दी। सीनेट में यह बिल 86-11 के अंतर से पारित हुआ। प्रस्तावित कानून का मकसद उन देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है, जो रूस से तेल, गैस और अन्य वस्तुओं की खरीद जारी रखते हैं और इस तरह रूसी अर्थव्यवस्था को राजस्व उपलब्ध करा रहे हैं।
अमेरिकी सांसदों का मानना है कि रूस से होने वाली ऊर्जा और अन्य सामानों की खरीद के जरिए मॉस्को को मिलने वाला आर्थिक लाभ यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध को लंबे समय तक चलाने में मदद कर रहा है। इसी वजह से इस विधेयक में रूस से व्यापार करने वाले देशों के खिलाफ कड़े टैरिफ लगाने का प्रावधान रखा गया है। यह कदम दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम के उस लंबे अभियान का भी नतीजा माना जा रहा है, जिसके जरिए वह यूक्रेन के लिए अमेरिकी समर्थन को मजबूत करने और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर युद्ध समाप्त करने का दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे।
यूक्रेन के साथ अमेरिका का समर्थन, रूस पर बढ़ेगा आर्थिक दबावइस विधेयक के सीनेट से पारित होने का घटनाक्रम यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की की अमेरिकी यात्रा के बाद सामने आया है। दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम के अंतिम संस्कार में शामिल होने के कुछ ही घंटों बाद ज़ेलेंस्की ने कैपिटल हिल का दौरा किया और दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के सीनेटरों के साथ मुलाकात की। इससे पहले पिछले सप्ताह सीनेट में इस व्यापक प्रतिबंध पैकेज को आगे बढ़ाने के लिए पहली प्रक्रियात्मक वोटिंग भी हुई थी।
अब प्रस्तावित प्रावधानों के तहत रूस से तेल, गैस अथवा अन्य सामान खरीदने वाले देशों पर अमेरिका 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकता है। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ सकता है जो रूस के साथ ऊर्जा कारोबार बनाए हुए हैं। अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि इस तरह के आर्थिक कदम रूस के राजस्व स्रोतों को कमजोर कर सकते हैं और मॉस्को पर युद्ध को लेकर बातचीत के लिए दबाव बढ़ा सकते हैं।
कनेक्टिकट से डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने इस बिल के समर्थन में बोलते हुए दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, आज राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की यूक्रेन से और पुतिन मॉस्को से देख रहे हैं। मुझे लगता है कि लिंडसे ग्राहम भी देख रहे होंगे। उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका यूक्रेन के लोगों को यह संदेश दे रहा है कि वे अकेले नहीं हैं और व्लादिमीर पुतिन को यूक्रेन पर जीत हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
रूस-यूक्रेन युद्ध पर ट्रंप सरकार का बड़ा कदमसीनेट में भारी बहुमत से इस पैकेज का पारित होना रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में उठाए गए सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक माना जा रहा है। रूस और यूक्रेन के बीच चार साल से अधिक समय से जारी संघर्ष अब भी समाप्त नहीं हुआ है और युद्ध को लेकर अमेरिका की रणनीति लगातार बदलती रही है।
ऐसे में रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने वाला यह प्रस्ताव आने वाले दिनों में वॉशिंगटन और मॉस्को के रिश्तों पर भी असर डाल सकता है। खासतौर पर उन देशों के लिए यह कदम महत्वपूर्ण है, जो रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पाद खरीदते हैं। यदि अमेरिकी प्रशासन इन देशों पर भारी टैरिफ लागू करता है, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा बाजार पर भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।
किन देशों पर पड़ सकता है असर?रूस से तेल और गैस खरीदने वाले कई देशों के लिए यह प्रस्ताव चिंता बढ़ाने वाला हो सकता है। चीन और भारत के अलावा अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया जैसे देश भी रूस से ऊर्जा उत्पादों की खरीद करते हैं। ऐसे में यदि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस कानून के तहत अतिरिक्त टैरिफ लगाने का फैसला लेते हैं, तो इन देशों के रूस के साथ व्यापार पर दबाव बढ़ सकता है।
प्रस्तावित पैकेज में अमेरिका को रूस से आयात होने वाली वस्तुओं पर बेहद ऊंचे टैरिफ लगाने की अतिरिक्त शक्ति देने की बात भी सामने आई है। कुछ परिस्थितियों में यह दर 500 प्रतिशत तक जा सकती है। इसका उद्देश्य उन देशों को रूस के साथ व्यापार जारी रखने से हतोत्साहित करना है, जो मॉस्को के साथ आर्थिक संबंध बनाए हुए हैं।
यदि ट्रंप प्रशासन इस पैकेज को आगे बढ़ाता है और इसे अंतिम मंजूरी मिल जाती है, तो रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों का दायरा और व्यापक हो सकता है। इसके तहत रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ-साथ रूस के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों पर भी नए प्रतिबंध लगाए जाने की संभावना बन सकती है।
फिलहाल सीनेट की मंजूरी के बाद सबकी नजर इस बात पर है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं। अगर अमेरिका रूस से कारोबार करने वाले देशों पर 100 प्रतिशत या उससे अधिक टैरिफ लागू करता है, तो इसका असर सिर्फ रूस पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अमेरिका के इन देशों के साथ आर्थिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।