खुल सकता है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जहाजों से नहीं वसूला जाएगा टोल; ट्रंप की मंजूरी बाकी

अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच अब एक राहत भरी खबर सामने आई है। दोनों देशों के अधिकारियों के बीच एक प्रारंभिक समझौते पर सहमति बनने की जानकारी सामने आई है, जिसे फिलहाल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अंतिम मंजूरी का इंतजार है। यदि इस समझौते को हरी झंडी मिल जाती है, तो दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में पैदा हुआ संकट काफी हद तक खत्म हो सकता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधियों ने 60 दिनों के एक समझौता ज्ञापन यानी एमओयू पर सहमति जताई है। इस प्रस्तावित डील का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से पूरी तरह खोलना माना जा रहा है। बीते दिनों इस समुद्री मार्ग पर बढ़े तनाव और प्रतिबंधों की वजह से वैश्विक ऊर्जा बाजार बुरी तरह प्रभावित हुआ था। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति बेहद चिंता का विषय बन गई थी क्योंकि दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला। इसका असर भारत में भी महसूस किया गया, जहां पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ गया। ऐसे में अगर जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है तो भारत सहित कई देशों को राहत मिल सकती है। युद्ध शुरू होने से पहले वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता था। लेकिन अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने यहां से जहाजों के गुजरने पर रोक लगा दी थी, जिसके जवाब में अमेरिका ने भी इलाके में सख्त नाकेबंदी लागू कर दी।

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, प्रस्तावित समझौते के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों को बिना किसी रुकावट के आवाजाही की अनुमति दी जाएगी। इतना ही नहीं, जहाजों से किसी प्रकार का टोल टैक्स भी नहीं लिया जाएगा। समझौते में यह भी तय किया गया है कि ईरान अगले 30 दिनों के भीतर समुद्री रास्तों में बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगा ताकि व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

इसके अलावा अमेरिका भी ईरानी बंदरगाहों पर लागू की गई नाकेबंदी को चरणबद्ध तरीके से हटाने पर सहमत हुआ है। माना जा रहा है कि यदि यह प्रक्रिया सफल रहती है तो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति में स्थिरता लौट सकती है। खासतौर पर एशियाई देशों को इससे काफी राहत मिलने की उम्मीद है।
समझौते का दूसरा अहम हिस्सा ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा हुआ है। अधिकारियों का कहना है कि इस मसौदे में ईरान ने परमाणु हथियार विकसित न करने की प्रतिबद्धता जताई है। प्रस्ताव लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच अगले 60 दिनों तक लगातार बातचीत जारी रहेगी। शुरुआती दौर की वार्ताओं में ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार और उसके भविष्य को लेकर चर्चा पर मुख्य फोकस रहेगा।

वहीं अमेरिका की ओर से भी कुछ रियायतों के संकेत दिए गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वॉशिंगटन प्रशासन ईरान पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में ढील देने, जब्त की गई ईरानी संपत्तियों को वापस करने और मानवीय सहायता एवं जरूरी वस्तुओं की सप्लाई बहाल करने पर विचार कर रहा है। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने साफ कहा है कि इस समझौते में किसी तरह की गुप्त आर्थिक डील या छिपी हुई शर्तें शामिल नहीं होंगी।

हालांकि समझौते की खबरों के बावजूद माहौल पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। बुधवार को हुई कैबिनेट बैठक के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, विदेश मंत्री मार्को रूबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने स्पष्ट संकेत दिए कि यदि बातचीत विफल होती है तो सैन्य कार्रवाई और तेज हो सकती है। ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में यहां तक कहा कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका कड़ा जवाब देने से पीछे नहीं हटेगा।

विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी बातचीत में प्रगति होने की बात स्वीकार की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अगले कुछ घंटे बेहद अहम होंगे। उन्होंने संकेत दिया कि अंतिम फैसला अभी बाकी है और यह कहना जल्दबाजी होगी कि ट्रंप समझौते पर कब हस्ताक्षर करेंगे।

इसी बीच एक अमेरिकी अधिकारी ने इस प्रस्तावित डील को ईरान के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का अवसर बताया। अधिकारी ने कहा कि ईरानी सत्ता तंत्र के भीतर ऐसे लोग मौजूद हैं जो मौजूदा हालात को बदलाव के मौके के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना था कि अगले 60 दिनों की बातचीत यह तय करेगी कि ईरान वास्तव में समझौते को लेकर कितना गंभीर है।

अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी दोहराया कि समझौते के तहत मिलने वाली आर्थिक राहत पूरी तरह ईरान के सहयोग और प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगी। उनका कहना है कि ईरान जितनी सकारात्मक भूमिका निभाएगा, उसे उतनी ही अधिक आर्थिक और कूटनीतिक राहत मिल सकती है। अब पूरी दुनिया की नजरें डोनाल्ड ट्रंप के अगले फैसले पर टिकी हुई हैं, क्योंकि उनकी मंजूरी के बाद ही यह समझौता आधिकारिक रूप से लागू हो सकेगा।