अमेरिका में H-1B वीजा पर काम करने वाले विदेशी पेशेवरों को लेकर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस वीजा के तहत काम करने वाले कर्मचारियों की तुलना ‘बंधुआ मजदूरों’ से की और आरोप लगाया कि कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को लाकर अमेरिकी कामगारों की नौकरियों और वेतन पर असर डाल रही हैं। इस बयान का महत्व भारतीय पेशेवरों के लिए खास है, क्योंकि हर साल मंजूर होने वाले H-1B आवेदनों में भारतीयों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक बताई गई है। वेंस की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब अमेरिकी प्रशासन ने आठ बड़ी कंपनियों को स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम यानी PERM से निलंबित करने की घोषणा की है। इनमें कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा, विप्रो, HCL, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी शामिल हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि रोजगार वीजा से जुड़ी व्यवस्था का इस्तेमाल अमेरिकी कर्मचारियों के अवसरों को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा था।
विदेशी और अमेरिकी कर्मचारियों की सैलरी में अंतर का दावाजेडी वेंस ने H-1B वीजा धारकों के वेतन को लेकर आंकड़े पेश करते हुए दावा किया कि विदेशी कर्मचारी समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी नागरिकों से कम कमाते हैं। उनके मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति H-1B वीजा पर अमेरिका में काम कर रहा है, तो उसकी कमाई उसी पद पर कार्यरत अमेरिकी नागरिक की तुलना में 20,000 डॉलर कम हो सकती है। वेंस ने आउटसोर्सिंग कंपनियों के जरिए अमेरिका आने वाले कर्मचारियों का जिक्र करते हुए वेतन का अंतर और अधिक बताया। उन्होंने कहा कि ऐसी विदेशी आउटसोर्सिंग कंपनी के माध्यम से आए कर्मचारी को समान पद पर काम करने वाले अमेरिकी नागरिक के मुकाबले 48,000 डॉलर कम मिल रहे हैं। इन आंकड़ों के आधार पर वेंस ने कंपनियों की भर्ती नीतियों पर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि कुछ कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करके अमेरिकी कर्मचारियों की जगह उन्हें रख रही हैं, जिससे वेतन घटाने और लागत कम करने में मदद मिलती है। ये आंकड़े और आरोप वेंस ने अपने बयान में रखे; उपलब्ध संदर्भ सामग्री में इनके समर्थन में अलग से विस्तृत आंकड़े या संबंधित कंपनियों का जवाब शामिल नहीं है।
कंपनियों पर अमेरिकी कर्मचारियों को हटाने का आरोपवेंस ने अपने संबोधन में कहा कि कंपनियां विदेशों से कर्मचारियों को इस तरह ला रही हैं, मानो वे बंधुआ मजदूर हों। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ कॉरपोरेशन अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से हटाकर ऐसे विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करते हैं, जिन्हें कम वेतन दिया जाता है। उनके अनुसार, इससे कंपनियों को आर्थिक फायदा होता है, जबकि अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार और वेतन पर दबाव पड़ता है। वेंस की टिप्पणी का केंद्र विदेशी कर्मचारियों की व्यक्तिगत योग्यता नहीं, बल्कि कंपनियों की भर्ती प्रक्रिया और वेतन संबंधी नीतियां थीं। हालांकि, उनके बयान में H-1B वीजा पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए ‘बंधुआ मजदूर’ शब्द का इस्तेमाल किया गया, जो इस मुद्दे पर अमेरिकी प्रशासन के कड़े रुख को दर्शाता है।
इंफोसिस, टाटा और विप्रो समेत 8 कंपनियां PERM से बाहरअमेरिकी प्रशासन ने कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा, विप्रो, HCL, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी को PERM यानी स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम से निलंबित किया है। इस कार्यक्रम के जरिए कंपनियां पात्र विदेशी कर्मचारियों के लिए रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती हैं। अमेरिकी श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग ने इन कंपनियों पर रोजगार वीजा कार्यक्रम का गलत इस्तेमाल करने और अमेरिकी कर्मचारियों से नौकरियां छीनने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि दुनिया की कुछ सबसे बड़ी IT आउटसोर्सिंग कंपनियों को PERM से हटाया जा रहा है।
सोंडरलिंग के अनुसार, इन कंपनियों से जुड़ी नई अर्जियां स्वीकार नहीं की जाएंगी और लंबित आवेदनों पर भी कार्रवाई नहीं होगी। इस घोषणा के तहत प्रभावित कंपनियों के माध्यम से ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में शामिल लोगों के आवेदनों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, संदर्भ सामग्री में पहले से मंजूर प्रमाणन या ग्रीन कार्ड आवेदनों की स्थिति को लेकर अलग से कोई विवरण नहीं दिया गया है।
माइक्रोसॉफ्ट को लेकर वेंस का सख्त संदेशवेंस ने माइक्रोसॉफ्ट का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि ग्रीन कार्ड पाने की प्रक्रिया में H-1B कर्मचारियों को प्रायोजित करने की कंपनी की क्षमता भी रोक दी गई है। उन्होंने कंपनी पर अमेरिकी कर्मचारियों के बजाय विदेशी कर्मचारियों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया। वीजा धोखाधड़ी पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट को संबोधित करते हुए कहा, “माइक्रोसॉफ्ट को हमारा संदेश है, आप एक बेहतरीन अमेरिकी कंपनी हैं, लेकिन आपको बेहतरीन अमेरिकी कर्मचारियों को काम पर रखना होगा।” इस बयान के जरिए वेंस ने अमेरिकी कंपनियों से घरेलू कर्मचारियों की भर्ती को प्राथमिकता देने की मांग की। हालांकि, उपलब्ध संदर्भ में माइक्रोसॉफ्ट की ओर से इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
भारतीय पेशेवरों पर क्यों पड़ सकता है ज्यादा असर?H-1B वीजा भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करने का एक अहम माध्यम है। संदर्भ सामग्री के मुताबिक, हर साल मंजूर होने वाले H-1B आवेदनों में भारतीयों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक है। ऐसे में विदेशी कर्मचारियों की भर्ती पर अमेरिकी प्रशासन की सख्ती भारतीय IT पेशेवरों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। PERM कार्यक्रम से आठ कंपनियों को हटाने का फैसला भी इस संदर्भ में अहम है, क्योंकि सूची में इंफोसिस, टाटा, विप्रो, HCL और कॉग्निजेंट जैसी कंपनियां शामिल हैं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी भारतीय H-1B कर्मचारियों के वीजा या अमेरिका में काम करने की अनुमति पर सीधा असर पड़ेगा। घोषित कार्रवाई विशेष रूप से PERM कार्यक्रम और संबंधित कंपनियों की नई तथा लंबित अर्जियों से जुड़ी है।
नौ विश्वविद्यालयों के J-1 वीजा कार्यक्रम की भी जांचवेंस ने H-1B वीजा के अलावा विश्वविद्यालयों में इस्तेमाल होने वाले J-1 वीजा कार्यक्रम पर भी सवाल उठाए। उन्होंने येल, हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड और कैलटेक समेत नौ प्रमुख विश्वविद्यालयों द्वारा शोधकर्ताओं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इस कार्यक्रम की जांच की घोषणा की। J-1 वीजा विदेशी नागरिकों को कुछ समय के लिए शैक्षणिक और शोध सहित आदान-प्रदान से जुड़े कार्यक्रमों में अमेरिका आने की सुविधा देता है। वेंस का आरोप था कि कुछ विश्वविद्यालय इस वीजा का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन संस्थानों में कुछ असामान्य हो रहा है और वीजा का इस्तेमाल अमेरिकी स्नातक छात्रों तथा शोधकर्ताओं के वेतन को कम करने के लिए किया जा रहा है। मिली जानकारी के अनुसार नौ विश्वविद्यालयों के नामों में से येल, हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड और कैलटेक का उल्लेख है। बाकी पांच संस्थानों के नाम या जांच के दायरे का विस्तृत ब्योरा नहीं दिया गया है।