17 साल पुरानी याचिकाओं पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, चुंगी नाका से आए कर्मचारियों को नियमित करने पर विचार करने के निर्देश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने उन कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है जो चुंगी नाका व्यवस्था खत्म होने के बाद पंचायती राज विभाग में समाहित किए गए थे। बुधवार को न्यायमूर्ति आनंद शर्मा की एकलपीठ ने 17 साल से लंबित याचिकाओं का निस्तारण करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि इन कर्मचारियों को नियमित करने पर विचार किया जाए। अदालत ने स्पष्ट कहा कि 38 साल की सेवा के बाद महज 1200 रुपए मासिक वेतन पर किसी कर्मचारी को रिटायर करना सीधा-सीधा शोषण है।

तीन दशक पुरानी नियुक्ति और शोषण का आरोप

याचिकाकर्ता सादत खान और अन्य की ओर से अधिवक्ता आमिर अजीज ने अदालत को बताया कि ये कर्मचारी लगभग तीन दशक पहले चुंगी व्यवस्था के तहत नियुक्त हुए थे। लेकिन चुंगी समाप्त होने के बाद उनकी सेवाओं को पंचायती राज विभाग में भेज दिया गया। यहां इन्हें नियमित वेतन और भत्ते देने की जगह शुरू में केवल 190 रुपए मासिक वेतन दिया गया, जो धीरे-धीरे बढ़कर 1200 रुपए हुआ। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि इतने वर्षों की सेवा के बावजूद उन्हें राज्य सरकार की अधिसूचना के आधार पर नियमित करना चाहिए था।

राज्य सरकार की दलील


वहीं, राज्य सरकार की ओर से याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा गया कि इन कर्मचारियों की नियुक्ति बिना भर्ती प्रक्रिया और स्वीकृत पदों पर की गई थी। हालांकि, चुंगी व्यवस्था समाप्त होने के बाद सरप्लस कर्मचारियों को समाहित करने का निर्णय लिया गया था और इसी क्रम में 14 नवंबर 2000 को पंचायती राज विभाग में कई अन्य कर्मचारियों को समाहित कर नियमित किया गया।
अदालत का रुख और निर्देश

हाईकोर्ट ने यह माना कि इतने वर्षों तक न्यूनतम वेतन पर सेवाएं लेना अन्यायपूर्ण है। अदालत ने कहा कि जब समान परिस्थिति में अन्य कर्मचारियों को नियमित किया गया था तो याचिकाकर्ताओं को भी उस तारीख से नियमित करने पर विचार किया जाए। न्यायमूर्ति आनंद शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं की सेवा और हालात को देखते हुए उन्हें उचित वेतनमान और सुविधाएं मिलनी चाहिए थीं।

कर्मचारियों के लिए राहत की उम्मीद

इस आदेश से उन कर्मचारियों को राहत मिलने की संभावना बढ़ गई है जिन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा कम वेतन पर गुजारा और अब तक नियमितीकरण की उम्मीद लगाए बैठे थे। अदालत के निर्देश से राज्य सरकार पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वह इन कर्मचारियों के भविष्य को लेकर ठोस कदम उठाए और उन्हें न्याय दिलाए।