कृष्ण जन्माष्टमी 2025: जयपुर के राधा दामोदर मंदिर में दोपहर को जन्मे नंदलाल, 500 साल पुरानी परंपरा ने सबको चौंकाया

कृष्ण जन्माष्टमी पर जहां पूरे देश में आधी रात को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की धूम रहती है, वहीं गुलाबी नगरी जयपुर का दृश्य कुछ हटकर होता है। यहां के ऐतिहासिक राधा दामोदर मंदिर में श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव रात में नहीं बल्कि दिन के उजाले में मनाया जाता है। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा भक्तों के लिए हमेशा ही आकर्षण का केंद्र रही है। माना जाता है कि ठाकुर जी दोपहर 12 बजे ही अवतरित होते हैं और भक्त विधिवत अभिषेक कर उनका स्वागत करते हैं। इस साल भी यह अनोखी परंपरा पूरे उल्लास और आस्था के साथ निभाई गई।

‘नंद घर आनंद भयो’ की गूंज से महका मंदिर परिसर

जन्माष्टमी के अवसर पर सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी थी। जैसे ही घड़ी ने दोपहर के 12 बजाए, पूरा प्रांगण “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा। शहनाइयों और बैंड की मधुर ध्वनि ने वातावरण को और भी भक्तिमय बना दिया। श्रद्धालुओं के चेहरों पर कान्हा के जन्म की खुशी झलक रही थी। मंदिर के महंत परिवार ने भी विशेष तैयारियां की थीं ताकि इस अवसर को अविस्मरणीय बनाया जा सके।

पंचामृत से हुआ अभिषेक, मनमोहक श्रृंगार ने मोहा मन

ठीक शुभ मुहूर्त में, दोपहर 12 बजे, बाल स्वरूप श्रीकृष्ण का विधिवत अभिषेक आरंभ हुआ। महंत मलय गोस्वामी ने मंत्रोच्चारण के साथ दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से बने पंचामृत से ठाकुर जी का स्नान कराया। इसके उपरांत भगवान का अलौकिक श्रृंगार किया गया। मोरपंख का मुकुट, हाथों में बांसुरी और झिलमिलाते आभूषणों से सजे नन्हे गोपाल के स्वरूप ने हर भक्त को मंत्रमुग्ध कर दिया। दर्शन के लिए आए श्रद्धालु भावविभोर होकर आरती और भजन में लीन हो गए।
क्यों मनाया जाता है दोपहर में जन्मोत्सव?

राधा दामोदर मंदिर की यह परंपरा पूरे देश में विशिष्ट मानी जाती है। जहां अन्य मंदिरों में रात 12 बजे जन्मोत्सव होता है, वहीं यहां दोपहर को ही सारे उत्सव संपन्न कर लिए जाते हैं। इसके पीछे एक रोचक कथा प्रचलित है। महंत परिवार का मानना है कि राधा दामोदर जी स्वयं भगवान कृष्ण के बाल रूप हैं। जैसे छोटे बच्चों को देर रात तक जगाना उचित नहीं माना जाता, वैसे ही ठाकुर जी को भी रात तक जगाया नहीं जाता। यही कारण है कि दोपहर में ही उनका जन्मोत्सव मनाया जाता है और शाम तक नंदोत्सव के बाद मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं।