राजस्थान: बुटाटी धाम में 22 करोड़ के घोटाले का दावा, सोने-चांदी से लेकर करोड़ों के खर्च तक जांच के घेरे में

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़े मामले की जांच के बीच अब राजस्थान के प्रसिद्ध बुटाटी धाम से भी करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया है। जांच में दावा किया गया है कि मंदिर में चढ़ावे के रूप में प्राप्त सोने-चांदी का रिकॉर्ड व्यवस्थित रूप से दर्ज नहीं किया गया। इसके अलावा भोजनशाला, रसोई, सुरक्षा, ग्राम विकास और अन्य मदों में लाखों-करोड़ों रुपये के खर्च को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। पूरा मामला नागौर जिले स्थित प्रसिद्ध श्री चतुरदास महाराज मंदिर (बुटाटी धाम) से जुड़ा है, जो लकवा से पीड़ित मरीजों और लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। अब इसी धार्मिक स्थल की वित्तीय व्यवस्था को लेकर सामने आई जांच रिपोर्ट ने प्रशासन और श्रद्धालुओं दोनों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

जांच रिपोर्ट में करीब 22 करोड़ रुपये की अनियमितताओं का दावा

डेगाना उपखंड अधिकारी (एसडीएम) द्वारा नागौर जिला कलेक्टर को सौंपी गई जांच रिपोर्ट में मंदिर विकास समिति के वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। प्रशासन की ओर से गठित 13 सदस्यीय जांच समिति ने वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 के ऑडिट रिकॉर्ड का मूल दस्तावेजों से मिलान किया। जांच के दौरान लगभग 22 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय गड़बड़ियों और अनियमितताओं के संकेत मिलने का दावा किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, समिति के तत्कालीन पदाधिकारियों से कई बार स्पष्टीकरण और संबंधित दस्तावेज मांगे गए, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर जांच दल ने चढ़ावे, न्यास की संपत्तियों और दान राशि के उपयोग में गंभीर अनियमितताओं की आशंका जताई है।
सोने-चांदी के रिकॉर्ड में भी सामने आई विसंगतियां

जांच के दौरान मंदिर में चढ़ावे के रूप में प्राप्त कीमती धातुओं के रिकॉर्ड को लेकर भी कई सवाल उठे। रिपोर्ट के मुताबिक, पुरानी समिति के पास 36 किलोग्राम चांदी और 250 ग्राम सोना दर्ज था, जबकि नई समिति ने कार्यभार ग्रहण करते समय 35.5 किलोग्राम चांदी और 280 ग्राम सोना प्राप्त होने का उल्लेख किया। वर्तमान बाजार मूल्य के अनुसार इस संपत्ति की कीमत करीब 2.60 करोड़ रुपये आंकी गई है।

हालांकि जांच में पाया गया कि इस बहुमूल्य संपत्ति का उचित लेखा-जोखा न तो स्टॉक रजिस्टर में दर्ज था और न ही वित्तीय अभिलेखों एवं लेखा पुस्तकों में इसका पूरा विवरण उपलब्ध कराया गया।

भोजनशाला और रसोई के खर्च पर भी उठे सवाल

रिपोर्ट में दावा किया गया कि दो वर्षों के दौरान भोजनशाला निर्माण पर करीब 49.49 लाख रुपये खर्च दर्शाए गए। जबकि जांच में सामने आया कि भवन के भूतल का निर्माण एक भामाशाह ने अपने निजी खर्च से कराया था। इसके बावजूद मंदिर निधि से इस कार्य के नाम पर राशि निकाले जाने और फर्जी बिल लगाए जाने की बात सामने आई।

इसी तरह रसोई संचालन के खर्च में भी असामान्य बढ़ोतरी दर्ज की गई। एक वर्ष के भीतर रसोई का खर्च 335 प्रतिशत बढ़ाकर 90.64 लाख रुपये दिखाया गया। दो वर्षों में कुल 1.17 करोड़ रुपये खर्च होने का उल्लेख किया गया, लेकिन जांच टीम को न तो सप्लायरों की सूची उपलब्ध कराई गई, न जीएसटी बिल और न ही भोजन प्राप्त करने वालों का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सौंपा गया।

सीसीटीवी, ग्राम विकास और अन्य मदों में भी मिलीं अनियमितताएं

जांच रिपोर्ट के अनुसार, दो वर्षों में सीसीटीवी कैमरों की स्थापना और रखरखाव पर 82.41 लाख रुपये खर्च दिखाए गए, जबकि इसके लिए कोई निविदा प्रक्रिया या कोटेशन उपलब्ध नहीं मिला। इसके अलावा ओवर-इनवॉइसिंग के भी संकेत मिले। जांच में एम जंक्शन सर्विसेज के नाम से 58.14 लाख रुपये के भुगतान का उल्लेख मिला, जबकि संबंधित वाउचर किसी अन्य फर्म रानाबाई ट्रेडर्स के नाम पाए गए। रिपोर्ट में इसे खातों के मिथ्याकरण का गंभीर मामला माना गया है।

इसके अलावा वर्ष 2024-25 में ग्राम विकास कार्यों पर 31.37 लाख रुपये खर्च दर्शाए गए, लेकिन न संबंधित ठेकेदारों का रिकॉर्ड मिला और न ही कार्यों का कोई भौतिक प्रमाण उपलब्ध कराया गया। मरम्मत, कंप्यूटर और फर्नीचर खरीद के नाम पर भी लगभग 97.48 लाख रुपये बिना बिल, वर्क ऑर्डर और माप पुस्तिका के खर्च दिखाए जाने का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है।

किराया, गोशाला और सुरक्षा खर्च को लेकर भी सवाल

जांच के दौरान सुलभ कॉम्प्लेक्स से प्राप्त 18.12 लाख रुपये के किराये का रिकॉर्ड भी मुख्य लेखा पुस्तकों में दर्ज नहीं मिला। वहीं गोशाला के रखरखाव पर 17.87 लाख रुपये खर्च दिखाए गए, लेकिन संबंधित गोशाला समिति ने ऐसी किसी राशि के प्राप्त होने से इनकार कर दिया।

सुरक्षा व्यवस्था के मद में 31.33 लाख रुपये खर्च दर्शाए गए, जहां जांच में यह भी सामने आया कि एक सुरक्षा गार्ड को 12 महीनों में 13 बार वेतन भुगतान दर्ज किया गया। इसके अलावा दान पेटी की आय के आंकड़ों में ऑडिट रिपोर्ट और रोकड़ बही के बीच अंतर पाया गया। विभिन्न बैंक खातों में भी लाखों रुपये का अंतर सामने आया, जिसका स्पष्ट हिसाब जांच अधिकारियों को नहीं दिया जा सका।

एसडीएम ने एफआईआर और फोरेंसिक ऑडिट की सिफारिश की

एसडीएम ने अपनी रिपोर्ट में मामले को गंभीर मानते हुए तत्कालीन अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष सहित कार्यकारिणी के सभी 11 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, खातों में हेरफेर और साक्ष्य नष्ट करने जैसी धाराओं में एफआईआर दर्ज कर पुलिस जांच शुरू करने की अनुशंसा की है।

इसके साथ ही वर्तमान समिति को तत्काल निलंबित कर मंदिर का प्रशासनिक प्रभार किसी राजपत्रित अधिकारी को सौंपने, कार्यालयों और अभिलेखों को सील करने, बैंक खातों एवं डिजिटल भुगतान प्रणाली को फ्रीज करने तथा पूरे मामले का स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट कराने की भी सिफारिश की गई है।

वहीं वर्तमान समिति के अध्यक्ष देवेंद्र सिंह ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि वे जिला कलेक्टर के समक्ष सभी दस्तावेज प्रस्तुत करेंगे। उनका आरोप है कि जांच के दौरान उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी को पूरी तरह शामिल नहीं किया गया। उल्लेखनीय है कि 29 जनवरी 2026 को तत्कालीन जिला कलेक्टर ने पहले छह सदस्यीय जांच समिति गठित की थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 13 सदस्यीय बनाया गया। करीब 146 दिनों तक चली जांच के बाद 23 जून 2026 को विस्तृत रिपोर्ट जिला कलेक्टर को सौंपी गई।