पंजाब में हिंदू वोटों पर AAP की नजर, ‘सनातनी’ रणनीति से BJP के बढ़ते जनाधार को चुनौती देने की तैयारी

पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी (AAP) ने धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर अपनी सक्रियता बढ़ाई है। पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने अमृतसर के ऐतिहासिक राम तीर्थ स्थल पर 150 करोड़ रुपये की लागत से लव-कुश मंदिर बनाने की घोषणा की है। इसके साथ ही पंजाब सरकार की ओर से धार्मिक आयोजनों, तीर्थयात्रा और मंदिरों से जुड़े कई फैसले भी सामने आए हैं। राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से इन कदमों को पंजाब के महत्वपूर्ण हिंदू मतदाता वर्ग तक पहुंच बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

राज्य में AAP की यह रणनीति ऐसे समय सामने आई है, जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने हाल के लोकसभा चुनाव में पंजाब में अपने वोट प्रतिशत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की थी। हालांकि पार्टी कोई लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, लेकिन कई विधानसभा क्षेत्रों में उसकी स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हुई।

धार्मिक आयोजनों पर AAP का जोर

पंजाब सरकार जून से सरकारी स्तर पर कई भक्ति संध्याओं का आयोजन कर रही है। अब इन्हें राज्य के सभी 22 प्रमुख शहरों तक ले जाने की योजना बताई गई है। इसके अलावा पटियाला के काली माता मंदिर के लिए 80 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।

सरकार की ओर से करीब 1.5 लाख श्रद्धालुओं के लिए हर साल मुफ्त तीर्थयात्रा योजना भी चलाई जा रही है। मंदिरों के प्रबंधन को अधिक अधिकार देने के लिए नए कानून और एक दर्जन से ज्यादा जाति कल्याण बोर्ड बनाए जाने की बात भी सामने आई है।

इन पहलों के बीच राम तीर्थ पर लव-कुश मंदिर बनाने की घोषणा ने AAP की धार्मिक राजनीति को लेकर चर्चा को और तेज कर दिया है।

केजरीवाल पहले भी अपनाते रहे हैं धार्मिक मुद्दे

AAP के लिए धार्मिक मुद्दों पर जोर देना पूरी तरह नया नहीं है। 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल ने टेलीविजन पर हनुमान चालीसा का पाठ किया था। इसके बाद 2022 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने भारतीय मुद्रा पर भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी की तस्वीर लगाने की मांग भी उठाई थी।

2024 में राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के दौरान दिल्ली की सभी 70 विधानसभा सीटों में सुंदरकांड और रामचरितमानस के पाठ का आयोजन कराया गया था।

इसी वजह से पंजाब में AAP के मौजूदा कदमों को पार्टी की पहले से चली आ रही धार्मिक अपील वाली राजनीति के विस्तार के तौर पर देखा जा रहा है।

पंजाब में BJP का वोट शेयर बढ़ा

2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में BJP का वोट शेयर बढ़कर 18.5 प्रतिशत हो गया। 2019 में यह 9.63 प्रतिशत और 2022 के विधानसभा चुनाव में 6.6 प्रतिशत था। हालांकि 2024 में BJP को राज्य में एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली, लेकिन 117 विधानसभा सीटों में से 24 पर वह आगे रही। इनमें ज्यादातर क्षेत्र शहरी बताए गए हैं।

पंजाब में हिंदू आबादी करीब 38.5 प्रतिशत बताई गई है। संख्या के लिहाज से यह राज्य का अल्पसंख्यक समुदाय है, लेकिन इसकी भौगोलिक मौजूदगी चुनावी गणित में इसे अहम बनाती है।
करीब 45 सीटों पर हिंदू वोट निर्णायक

राज्य में करीब 37.5 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है, जबकि लगभग 59 प्रतिशत हिंदू मतदाता शहरों और कस्बों में केंद्रित हैं। 117 विधानसभा सीटों में से 34 सीटों पर हिंदू समुदाय सबसे बड़ा सामाजिक समूह बताया गया है।

करीब 45 सीटें ऐसी हैं जहां हिंदू मतदाता या तो स्पष्ट बहुमत में हैं या चुनावी नतीजे को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन करने वाला राजनीतिक दल भी शहरी और हिंदू बहुल इलाकों में मजबूत प्रदर्शन के जरिए सत्ता के समीकरण पर असर डाल सकता है।

हिंदू मतदाताओं का बदलता राजनीतिक रुख

पंजाब के हिंदू मतदाता किसी एक राजनीतिक दल के साथ स्थायी रूप से नहीं रहे हैं। 1970 और 1980 के दशक में उग्रवाद के दौर के दौरान शहरी कारोबारी और सरकारी कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ रहा।

1997 में शिरोमणि अकाली दल और BJP के बीच गठबंधन बनने के बाद दोनों दलों के बीच एक स्पष्ट राजनीतिक आधार विकसित हुआ। अकाली दल ने मुख्य रूप से ग्रामीण सिख मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि BJP को शहरी हिंदू समर्थन का लाभ मिला।

2020 में यह गठबंधन टूट गया। इसके बाद BJP की ग्रामीण क्षेत्रों में पकड़ कमजोर हुई, जबकि अकाली दल को शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच पहले जैसा समर्थन नहीं मिला। 2022 के विधानसभा चुनाव में इस बदले समीकरण का फायदा AAP को मिला और पार्टी ने माझा तथा मालवा के शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच बेहतर प्रदर्शन किया।

कुछ फीसदी वोटों का बदलाव बदल देता है सत्ता का गणित

पंजाब की चुनावी राजनीति में हिंदू मतदाताओं को अक्सर शांत लेकिन प्रभावशाली वोटर समूह के रूप में देखा जाता है। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, इस वर्ग के वोटों में सीमित बदलाव भी विधानसभा के परिणामों पर बड़ा असर डाल सकता है।

2002 से 2007 के बीच कांग्रेस के हिंदू वोटों में 13.5 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई थी। इसके बाद पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। इसी तरह 2012 से 2017 के बीच अकाली दल-BJP गठबंधन के हिंदू वोटों में 10.5 प्रतिशत की गिरावट आई और गठबंधन 18 सीटों तक सिमट गया।

बंगाल मॉडल से अलग है पंजाब का समीकरण

पश्चिम बंगाल में BJP ने हिंदू मतदाताओं के व्यापक ध्रुवीकरण के जरिए अपना आधार मजबूत किया। लेकिन पंजाब की सामाजिक संरचना इससे अलग है। यहां हिंदू समुदाय किसी एक प्रमुख जाति या वर्ग तक सीमित नहीं है। इसमें व्यापारी, उद्योगपति, पेशेवर और अलग-अलग सामाजिक समूह शामिल हैं।

राज्य की नीतियों और वित्तीय आवंटन का लंबे समय से कृषि पर अधिक जोर रहने के कारण शहरी कारोबारी और उद्योग जगत के बीच उपेक्षा की भावना होने की बात भी सामने आती रही है।

ऐसे में AAP का मौजूदा ‘सनातनी’ रुख पंजाब के शहरी हिंदू मतदाताओं और BJP के बढ़ते समर्थन आधार के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि इसका वास्तविक चुनावी असर आने वाले चुनावों में ही स्पष्ट होगा।