तोतों से हुआ अनार की फसल को नुकसान, अब सरकार देगी मुआवजा; 10 साल बाद आया कोर्ट का फैसला

महाराष्ट्र के वर्धा जिले से एक अनोखा और चर्चा में आया मामला सामने आया है, जहां एक किसान की फसल को हुए नुकसान ने अदालत तक लंबी कानूनी लड़ाई का रूप ले लिया। करीब एक दशक तक चले इस विवाद में अब Bombay High Court ने अहम फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को मुआवजा देने का निर्देश दिया है। यह मामला इसलिए भी खास बन गया है क्योंकि नुकसान किसी इंसान या प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि पक्षियों—खासकर तोतों—की वजह से हुआ था।

तोतों के हमले से तबाह हुए अनार के बाग

जानकारी के मुताबिक, वर्धा के हिंगी गांव के किसान महादेव डेकाटे ने शिकायत की थी कि साल 2016 में पास के वन्यजीव अभयारण्य से आए जंगली तोतों के झुंड ने उनके अनार के बाग को भारी नुकसान पहुंचाया। किसान के अनुसार, करीब 200 अनार के पेड़ों को इन पक्षियों ने नुकसान पहुंचाया, जिससे उनकी मेहनत और आय पर गहरा असर पड़ा। इस नुकसान की भरपाई के लिए उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

‘वन्य प्राणी’ होने के कारण बना मामला खास

नागपुर पीठ की न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता ने इस मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि तोते भी Wildlife Protection Act, 1972 के तहत संरक्षित ‘वन्य प्राणी’ की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में यदि इनसे किसी नागरिक की संपत्ति को नुकसान होता है, तो उसकी भरपाई करना राज्य की जिम्मेदारी बनती है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसानों को ऐसे मामलों में मुआवजा नहीं मिलेगा, तो वे मजबूर होकर वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने वाले कदम उठा सकते हैं, जो कानून के उद्देश्य के खिलाफ होगा
सरकार के तर्क को कोर्ट ने किया खारिज

राज्य सरकार ने अपनी ओर से यह दलील दी थी कि पूर्व में जारी सरकारी प्रस्तावों के अनुसार मुआवजा केवल कुछ विशेष जानवरों—जैसे जंगली हाथी या जंगली भैंस—द्वारा किए गए नुकसान पर ही दिया जाता है। लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय का कहना था कि मुआवजा नीति का मूल उद्देश्य प्रभावित किसानों को राहत देना है, इसलिए इसे सीमित दायरे में नहीं बांधा जा सकता।

मुआवजे का आदेश और फैसला

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि किसान को 200 पेड़ों के नुकसान के लिए प्रति पेड़ 200 रुपये के हिसाब से मुआवजा दिया जाए। 24 अप्रैल को पारित इस आदेश की प्रति बाद में सार्वजनिक की गई, जिसके बाद यह मामला चर्चा का विषय बन गया।

10 साल की लड़ाई के बाद मिला न्याय


करीब दस साल तक चले इस कानूनी संघर्ष के बाद किसान को राहत मिली है। यह फैसला न केवल उनके लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि उन अन्य किसानों के लिए भी मिसाल बन सकता है, जो वन्यजीवों के कारण फसल नुकसान झेलते हैं। इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वन्यजीव संरक्षण और किसानों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।