दिल्ली सरकार अब उन भवनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की तैयारी में है, जिनके निर्माण के दौरान दिल्ली जल बोर्ड (DJB) का पानी और सीवर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड चार्ज (Infrastructure Fund Charge- IFC) जमा नहीं कराया गया। इस दिशा में दिल्ली जल बोर्ड ने दिल्ली नगर निगम (MCD) से पिछले पांच वर्षों के सभी स्वीकृत बिल्डिंग प्लान का रिकॉर्ड मांगा है। यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी भवन के लिए अनिवार्य IFC शुल्क जमा नहीं किया गया, तो संबंधित संपत्तियों पर सीलिंग सहित अन्य कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
दिल्ली के जल मंत्री प्रवेश वर्मा ने स्पष्ट किया कि नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानून के तहत सख्त कदम उठाए जाएंगे। हालांकि, कार्रवाई से पहले सभी संबंधित पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर भी दिया जाएगा।
सरकार ने पहले आसान किए थे इंफ्रास्ट्रक्चर चार्ज के नियमबुधवार को मीडिया से बातचीत के दौरान जल मंत्री प्रवेश वर्मा ने बताया कि वर्ष की शुरुआत में दिल्ली सरकार ने आम लोगों, हाउसिंग सोसायटियों, संस्थानों और औद्योगिक इकाइयों को राहत देने के उद्देश्य से इंफ्रास्ट्रक्चर चार्ज की व्यवस्था को सरल बनाया था। साथ ही कई मामलों में शुल्क भी पहले की तुलना में काफी कम कर दिया गया, ताकि निर्माण कार्य में अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े।
बिल्डरों और अधिकारियों की मिलीभगत का संदेहप्रवेश वर्मा ने कहा कि विभागीय स्तर पर की गई शुरुआती जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जांच में पता चला कि राजधानी की कई बड़ी ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों का निर्माण बिना IFC शुल्क जमा किए ही पूरा कर लिया गया।
उनके मुताबिक, शुरुआती जांच से यह आशंका मजबूत हुई है कि कुछ मामलों में बिल्डरों और दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारियों के बीच मिलीभगत हो सकती है। उन्होंने साफ कहा कि जिन लोगों ने अनिवार्य शुल्क जमा नहीं किया है, उनके खिलाफ केवल जुर्माना ही नहीं लगाया जाएगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर संबंधित इमारतों को सील भी किया जाएगा।
MCD के रिकॉर्ड से होगा डेटा का मिलानजल मंत्री ने बताया कि दिल्ली नगर निगम से पिछले पांच वर्षों में स्वीकृत सभी बिल्डिंग प्लान का पूरा रिकॉर्ड मांगा गया है। अब इस डेटा का मिलान दिल्ली जल बोर्ड के रिकॉर्ड से किया जाएगा, जिसमें IFC शुल्क जमा कराने का विवरण उपलब्ध है।
यदि जांच के दौरान किसी भी प्रकार की अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित संपत्ति मालिकों से मूल बकाया राशि के साथ निर्धारित जुर्माना भी वसूला जाएगा। सरकार का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से पूरा किया जाएगा।
300 से ज्यादा बड़ी संपत्तियां जांच के घेरे मेंविभाग के शुरुआती आकलन के अनुसार राजधानी में 3000 वर्गमीटर या उससे बड़े क्षेत्रफल वाली करीब 300 ऐसी संपत्तियां हैं, जिनके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर फंड चार्ज जमा नहीं कराया गया। अधिकारियों का अनुमान है कि इसके कारण दिल्ली जल बोर्ड को करीब 2,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है।
प्रवेश वर्मा ने कहा कि सरकार ने अब पूरी IFC व्यवस्था में व्यापक सुधार किए हैं। नई प्रणाली को पहले की तुलना में अधिक सरल, पारदर्शी और जवाबदेह बनाया गया है, ताकि भविष्य में इस तरह की अनियमितताओं की संभावना कम हो सके।
छोटे प्लॉट मालिकों को मिली राहतसरकार ने नई नीति के तहत 200 वर्गमीटर तक के प्लॉटों को इंफ्रास्ट्रक्चर चार्ज से पूरी तरह छूट देने का फैसला किया है। इसके अलावा अधिकारियों द्वारा अनावश्यक माप-जोख या लोगों को परेशान करने जैसी शिकायतों पर भी रोक लगाने की व्यवस्था की गई है।
जल मंत्री के अनुसार, पहले कई लोगों को पुराने नियमों के तहत 15 से 16 लाख रुपये तक IFC शुल्क देना पड़ता था, लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद कई मामलों में यही राशि घटकर लगभग 2 से 3 लाख रुपये रह गई है।
क्या होता है IFC चार्ज?दिल्ली में 200 वर्गमीटर से बड़े प्लॉट पर नया निर्माण या अतिरिक्त निर्माण कराने की स्थिति में दिल्ली जल बोर्ड की ओर से इंफ्रास्ट्रक्चर फंड चार्ज (IFC) लिया जाता है। यह शुल्क पानी की आपूर्ति और सीवरेज से जुड़े बुनियादी ढांचे के विकास के लिए निर्धारित किया गया है और निर्माण कार्य शुरू होने से पहले इसका भुगतान करना अनिवार्य होता है।
हाल ही में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने IFC चार्ज से जुड़ी नई नीति को मंजूरी दी थी। संशोधित व्यवस्था का सबसे अधिक लाभ फैक्ट्रियों और औद्योगिक इकाइयों को मिला है, क्योंकि इससे शुरुआती निर्माण लागत में उल्लेखनीय कमी आई है और परियोजनाओं को शुरू करना पहले की तुलना में अधिक आसान हो गया है।