पांच राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस ने अपनी चुनावी रणनीति को नए सिरे से आकार देना शुरू कर दिया है। पार्टी अब दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, ओबीसी और आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण वर्गों को एक साझा राजनीतिक और सामाजिक मंच पर लाने की व्यापक कवायद में जुटी हुई है। इस पूरे अभियान की शुरुआती दिशा खास तौर पर दलित और मुस्लिम समुदायों के बीच एकजुटता को मजबूत करने पर केंद्रित है।
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग और अल्पसंख्यक विभाग ने मिलकर एक विस्तृत राष्ट्रीय सोशल इंजीनियरिंग खाका तैयार किया है। पार्टी का मानना है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में इन समुदायों के साझा मुद्दों, अधिकारों और सामाजिक चुनौतियों को आधार बनाकर एक मजबूत जनाधार तैयार किया जा सकता है, जो चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम ने एबीपी न्यूज से बातचीत में बताया कि पार्टी जल्द ही एक राष्ट्रीय स्तर का बड़ा अधिवेशन आयोजित करने जा रही है। इस अधिवेशन में दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के साथ-साथ गरीब, पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण वर्ग के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया जाएगा। इसके बाद एक व्यापक राष्ट्रीय सम्मेलन की योजना बनाई गई है, जिसमें दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, ओबीसी और कमजोर आर्थिक वर्गों के प्रतिनिधि एक साथ मंच साझा करेंगे। इस कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी भी प्रस्तावित है।
6 जून से दिल्ली में अभियान की औपचारिक शुरुआतपार्टी सूत्रों के मुताबिक इस पूरे अभियान की औपचारिक शुरुआत 6 जून को राजधानी दिल्ली में होने वाले संयुक्त सम्मेलन के जरिए की जाएगी। इस सम्मेलन में पार्टी नेताओं और संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, कलाकार और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।
बैठक का मुख्य उद्देश्य दलित और अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करना और एक व्यावहारिक रोडमैप तैयार करना है। यह रोडमैप भविष्य में पार्टी की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय रणनीतियों का आधार बनेगा।
दिल्ली में तैयार किए जाने वाले इस ब्लूप्रिंट को बाद में पार्टी नेतृत्व के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। इसके बाद इसे जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर जैसे चुनावी राज्यों में भी इसी तरह के क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे।
35 से 40 प्रतिशत वोट समीकरण पर कांग्रेस की नजरराजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार जिन राज्यों में आगामी चुनाव प्रस्तावित हैं, वहां दलित और अल्पसंख्यक समुदाय मिलकर लगभग 35 से 40 प्रतिशत तक प्रभावशाली वोट बैंक का गठन करते हैं। कांग्रेस का मानना है कि यदि इन वर्गों को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाया जा सके तो इसका सीधा लाभ चुनावी परिणामों में देखने को मिल सकता है।
सूत्रों का कहना है कि पार्टी की दीर्घकालिक रणनीति में इस सामाजिक गठबंधन का विस्तार भी शामिल है, जिसमें भविष्य में अति पिछड़े वर्ग, व्यापक ओबीसी समाज और आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण वर्गों को भी जोड़ा जा सकता है, ताकि एक व्यापक सामाजिक समीकरण तैयार किया जा सके।
'संविधान बचाओ' अभियान से मिली ऊर्जा के बाद नई राजनीतिक दिशाकांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी द्वारा चलाए गए 'संविधान बचाओ' अभियान को दलित समाज से उल्लेखनीय समर्थन मिला था, जिसका सकारात्मक प्रभाव पार्टी के प्रदर्शन पर भी दिखाई दिया। इसी अनुभव को आधार बनाकर अब पार्टी सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के मुद्दों को अपने राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में रखने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
सूत्रों के अनुसार, हाल ही में राहुल गांधी ने अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं के साथ हुई बैठकों में यह स्पष्ट संकेत दिया है कि सामाजिक अन्याय और वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दों को बिना किसी संकोच के प्रमुखता से उठाया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने पार्टी नेताओं से कहा है कि इन विषयों पर खुलकर और स्पष्ट रूप से अपनी आवाज़ रखी जाए, ताकि जमीनी स्तर पर प्रभावी संदेश पहुंच सके।