बिहार फ्लोर टेस्ट में सम्राट चौधरी से ज्यादा तेजस्वी यादव पर क्यों टिकी निगाहें, कहीं साथ तो नहीं छोड़ देंगे RJD विधायक?

बिहार विधानसभा में होने जा रहा फ्लोर टेस्ट केवल मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार के बहुमत का औपचारिक परीक्षण नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव के लिए कहीं अधिक निर्णायक राजनीतिक क्षण बताया जा रहा है। सत्ता पक्ष की संख्या बल भले ही मजबूत हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही घूम रहा है कि क्या महागठबंधन के विधायक इस बार भी एकजुट रहेंगे या फिर पिछले अनुभवों की तरह “पाला बदल” की कहानी दोहराई जाएगी?

पिछली घटनाओं ने तेजस्वी की चिंता और बढ़ा दी

तेजस्वी यादव की बेचैनी के पीछे आधार भी ठोस माना जा रहा है। 12 फरवरी 2024 के पिछले फ्लोर टेस्ट के दौरान उन्होंने सदन के बाहर “खेला होने” के आरोप लगाए थे, लेकिन नतीजा उनके पक्ष में नहीं गया। उस समय RJD के कुछ विधायक—जिनमें चेतन आनंद, नीलम देवी और प्रहलाद यादव जैसे नाम शामिल रहे—पक्ष बदलकर NDA खेमे में चले गए थे। इससे सरकार गिराने की रणनीति तो विफल हुई ही, साथ ही महागठबंधन की एकजुटता और विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए थे।

राज्यसभा चुनाव में भी दोहराई गई कमजोरी की कहानी

यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। इसके बाद हुए राज्यसभा चुनाव में भी महागठबंधन को बड़ा झटका लगा। उस दौरान कांग्रेस के तीन और RJD का एक विधायक या तो क्रॉस वोटिंग में शामिल रहे या फिर मतदान प्रक्रिया से दूर रहे। इस घटनाक्रम ने यह धारणा और मजबूत कर दी कि तेजस्वी यादव अपनी राजनीतिक टीम को पूरी तरह एकजुट रखने में संघर्ष कर रहे हैं।
महागठबंधन का मौजूदा गणित इस प्रकार है:

आरजेडी: 25 विधायक
कांग्रेस: 6 विधायक
सीपीआईएमएल: 2 विधायक
सीपीआईएम: 1 विधायक
आईआईपी: 1 विधायक
कुल: 35 विधायक

सीमित संख्या, बढ़ता दबाव: हर विधायक बन गया निर्णायक

इस बार हालात पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हैं। महागठबंधन की कुल ताकत केवल 35 विधायकों तक सीमित है, जिससे हर एक सदस्य की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव के सामने इस फ्लोर टेस्ट में सरकार गिराने का लक्ष्य प्राथमिक नहीं है, बल्कि सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को टूटने से बचाकर एकजुट रखना है।

अगर इस बार भी किसी विधायक के पाला बदलने या अनुपस्थित रहने की स्थिति बनती है, तो इसका असर केवल इस सत्र तक सीमित नहीं रहेगा। यह सीधे तौर पर तेजस्वी यादव की नेतृत्व क्षमता और 2025 की राजनीतिक रणनीति पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर सकता है।

आज का फ्लोर टेस्ट: सत्ता नहीं, संदेश की असली लड़ाई

एनडीए के पास पहले से ही स्पष्ट और मजबूत बहुमत है, ऐसे में सम्राट चौधरी की सरकार के लिए विश्वास मत हासिल करना लगभग तय माना जा रहा है। इसलिए सदन के भीतर असली टकराव संख्या का नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश का है।

अगर महागठबंधन के सभी विधायक एकजुट दिखाई देते हैं, तो तेजस्वी यादव यह संदेश देने में सफल होंगे कि उन्होंने पार्टी अनुशासन को मजबूत किया है। लेकिन अगर एक भी विधायक बिखरता है, तो विपक्ष की कमजोर पकड़ एक बार फिर सार्वजनिक रूप से उजागर हो जाएगी।

तेजस्वी की रणनीति पर टिकी पूरी सियासत की नजर

यह फ्लोर टेस्ट अब केवल संसदीय प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह तय करेगा कि तेजस्वी यादव सिर्फ एक आक्रामक विपक्षी नेता हैं या फिर संगठन को संभालने में सक्षम एक मजबूत रणनीतिकार भी। बिहार की राजनीति में इसे इसी नजर से देखा जा रहा है कि यह दिन सरकार के लिए औपचारिकता हो सकता है, लेकिन तेजस्वी यादव के लिए यह उनकी राजनीतिक परीक्षा का सबसे कठिन चरण है।