बिहार में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, सत्ताधारी एनडीए गठबंधन में मतभेद और असंतोष की रेखाएं और स्पष्ट होती जा रही हैं। गठबंधन के तीन प्रमुख घटक—भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास)—अब एक-दूसरे के सामने खड़े दिख रहे हैं। वहीं, राष्ट्रीय लोक जनता पार्टी (रालोजपा) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा भी अपने मतभेदों को लेकर खुलकर सामने आ चुके हैं।
इस बार चुनावी गठबंधन में जेडीयू पहले की तरह 'बड़े भाई' की भूमिका में नहीं दिख रही। सीट बंटवारे में भाजपा और जेडीयू लगभग बराबरी पर आ गए हैं, जिससे नीतीश कुमार की नाराजगी और बढ़ गई है। सूत्रों के मुताबिक, नीतीश इस बार भी बड़े भाई के रूप में गठबंधन का नेतृत्व करना चाहते थे, लेकिन सीटों के गणित ने उनकी राजनीतिक पकड़ को थोड़ा कमजोर कर दिया है।
इसी खींचतान के बीच महुआ सीट को लेकर नया विवाद सामने आया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा इस सीट पर जोर देते रहे हैं, जबकि यह सीट गठबंधन की अंदरूनी सहमति के अनुसार चिराग पासवान की पार्टी के हिस्से में आ चुकी है। कुशवाहा की पार्टी को कुल छह सीटें दी गई हैं, जबकि चिराग को 29। इससे कुशवाहा समर्थक नाराज़ हैं और उन्होंने नामांकन प्रक्रिया से दूरी बनाने तक की चेतावनी दी है। हालांकि, बाद में यह खबर सामने आई कि महुआ सीट के बदले कुशवाहा को एक एमएलसी सीट देने पर सहमति बनी है।
दूसरी ओर, नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने एक और मोर्चा खोल दिया है। पार्टी ने जिन 57 उम्मीदवारों की सूची जारी की है, उसमें पांच ऐसी सीटें शामिल हैं जो सीट बंटवारे के अनुसार चिराग पासवान की पार्टी के हिस्से में जानी थीं। ये सीटें हैं – सोनबरसा, मोरवा, एकमा, गायघाट और राजगीर। इन सभी पर जेडीयू ने अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं, जिससे चिराग पासवान की स्थिति असहज हो गई है।
नीतीश कुमार इस बात से भी असंतुष्ट हैं कि उनकी कुछ पारंपरिक सीटें चिराग की पार्टी को दे दी गई हैं। गौरतलब है कि चिराग पासवान खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 'हनुमान' बताते रहे हैं, लेकिन अब नीतीश इस समीकरण से खुद को हाशिए पर जाता देख रहे हैं।
एनडीए की परेशानी केवल नीतीश और कुशवाहा तक सीमित नहीं है। जीतन राम मांझी भी कम सीटें मिलने से नाराज बताए जा रहे हैं। ऐसे में बिहार एनडीए की एकता और सीटों का तालमेल एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुका है।
हालांकि, फिलहाल की राहत की बात यह है कि चिराग पासवान की पार्टी ने इन विवादित पांच सीटों पर अब तक अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है, जिससे संकेत मिलते हैं कि बातचीत की गुंजाइश अभी बाकी है। चूंकि पहले चरण के नामांकन की अंतिम तिथि 17 अक्टूबर है, इसलिए सभी की नजरें अब गृह मंत्री अमित शाह पर टिकी हैं कि क्या वह इस टकराव को शांत करने में कामयाब होंगे।