वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने पर छिड़ा विवाद, अरशद मदनी ने जताई कड़ी आपत्ति

केंद्र सरकार द्वारा वंदे मातरम् को लेकर जारी किए गए नए दिशा-निर्देशों ने राजनीतिक और धार्मिक हलकों में बहस को तेज कर दिया है। बुधवार (11 फरवरी) को जारी आदेश के अनुसार अब सरकारी समारोहों, शैक्षणिक संस्थानों और कई अहम सार्वजनिक आयोजनों में वंदे मातरम् का गायन या वादन अनिवार्य होगा। साथ ही, इसकी प्रस्तुति के दौरान सभी उपस्थित लोगों को राष्ट्रगान की तरह खड़े होकर सम्मान प्रकट करना होगा। सरकार के इस फैसले के बाद एक बार फिर इस मुद्दे पर सियासी घमासान शुरू हो गया है, खासकर कुछ मुस्लिम संगठनों ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए इस निर्णय की आलोचना की। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों में उसकी पूरी रचना के साथ अनिवार्य करना एकतरफा और थोपे गए फैसले जैसा प्रतीत होता है। उनके मुताबिक यह कदम संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के विपरीत है और अल्पसंख्यक समुदायों की भावनाओं की अनदेखी करता है।

धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला

अरशद मदनी ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम समाज किसी को वंदे मातरम् गाने या उसकी धुन बजाने से नहीं रोकता। उनका कहना था कि विवाद का कारण गीत की कुछ पंक्तियां हैं, जिनमें मातृभूमि को देवी स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है। मदनी के अनुसार, इस तरह की अभिव्यक्ति एकेश्वरवाद की उस अवधारणा से मेल नहीं खाती, जिसे इस्लाम मानता है। उन्होंने दलील दी कि मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करते हैं, इसलिए उन्हें ऐसी पंक्तियां पढ़ने के लिए बाध्य करना संविधान के अनुच्छेद 25 में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।

उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों में भी धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की आजादी को महत्व दिया गया है। ऐसे में किसी विशेष धार्मिक भावना से टकराने वाली अभिव्यक्ति को अनिवार्य करना संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

सरकार पर राजनीतिक मंशा का आरोप

मदनी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि देशभक्ति का अर्थ किसी गीत या नारे को अनिवार्य करना नहीं है। उनके अनुसार, सच्चा राष्ट्रप्रेम नागरिकों के आचरण, त्याग और योगदान से झलकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे निर्णय चुनावी राजनीति और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकते हैं तथा आम जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से भटका सकते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद और देश के मुसलमानों का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान किसी से छिपा नहीं है। इसलिए देशप्रेम पर सवाल उठाना या उसे किसी खास प्रतीक से जोड़ देना उचित नहीं है।

स्पष्ट रुख दोहराया

अपनी बात को दोहराते हुए अरशद मदनी ने कहा कि मुसलमान अनेक कठिन परिस्थितियों को सहन कर सकते हैं, लेकिन ईश्वर की अवधारणा में किसी को साझेदार ठहराना उनके धार्मिक विश्वास के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् को अनिवार्य करना संविधान की मूल भावना, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

सरकार के इस निर्णय और उस पर उठी आपत्तियों के बीच अब यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन गया है। आने वाले दिनों में इस विषय पर और तीखी बहस देखने को मिल सकती है, क्योंकि एक ओर इसे राष्ट्रसम्मान से जोड़ा जा रहा है, तो दूसरी ओर धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का प्रश्न उठाया जा रहा है।