क्या फिर महंगा होगा पेट्रोल-डीजल और LPG? तेल कंपनियों को अब नहीं मिलेगा सरकारी सहारा, बढ़ सकती है आम लोगों की चिंता

मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा आपूर्ति पर बढ़ते दबाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच देश में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों को लेकर नई आशंकाएं पैदा हो गई हैं। अब तक सरकारी तेल विपणन कंपनियों को आर्थिक राहत देकर कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश कर रही केंद्र सरकार ने आगे अतिरिक्त वित्तीय सहायता देने से इनकार कर दिया है। ऐसे में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या आने वाले समय में ईंधन और रसोई गैस के दामों में फिर बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

वित्त मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार बीते कुछ महीनों में इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल जैसी सरकारी तेल कंपनियों को लगभग 1.23 लाख करोड़ रुपये की राहत उपलब्ध करा चुकी है। हालांकि अब सरकार का मानना है कि लगातार बढ़ते वित्तीय बोझ के बीच किसी एक सेक्टर को अनिश्चितकाल तक सहायता देना संभव नहीं है। ऐसे में तेल कंपनियों को भविष्य में अपनी वित्तीय चुनौतियों का सामना काफी हद तक स्वयं करना पड़ सकता है।

उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सरकार ने उठाया था बड़ा कदम

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल के दौरान केंद्र सरकार ने उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाने के उद्देश्य से कई कदम उठाए थे। सरकार ने न केवल तेल कंपनियों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहयोग दिया, बल्कि पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती कर राजस्व का बड़ा हिस्सा भी छोड़ दिया।

सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, शुरुआती 78 दिनों के दौरान सरकार ने कंपनियों के बढ़ते घाटे को संतुलित करने के लिए लगभग 1.23 लाख करोड़ रुपये का समर्थन दिया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद आम उपभोक्ताओं पर तत्काल बोझ न पड़े।
78 दिन बाद बदला सरकार का रुख

हालांकि लंबे समय तक वित्तीय सहायता देने के बाद अब सरकार ने अपना रुख बदल लिया है। वित्त मंत्रालय का मानना है कि लगातार सब्सिडी या वित्तीय समर्थन जारी रखना व्यावहारिक नहीं है। इसी वजह से आगे अतिरिक्त राहत पैकेज देने की संभावना से इनकार किया गया है।

सूत्रों का कहना है कि सरकार चाहती है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती लागत का कुछ हिस्सा धीरे-धीरे उपभोक्ता स्तर पर भी परिलक्षित हो। इसी पृष्ठभूमि में 15 मई के बाद पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी की कीमतों में कई बार संशोधन किए जा चुके हैं। हालांकि सरकार या तेल कंपनियों की ओर से भविष्य में कीमत बढ़ाने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

रोजाना सैकड़ों करोड़ रुपये का नुकसान झेल रहीं कंपनियां


सरकारी सूत्रों के मुताबिक, हाल के सप्ताहों में कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति अभी भी दबाव में बनी हुई है। अनुमान है कि इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल जैसी कंपनियों को संयुक्त रूप से प्रतिदिन लगभग 652 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2026 में भारतीय बास्केट के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत 114.48 डॉलर प्रति बैरल दर्ज की गई थी, जबकि मई 2026 में यह 106.23 डॉलर प्रति बैरल रही। वर्तमान समय में भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 93 से 94 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है।

दूसरी ओर वैश्विक बाजार में एलपीजी की कीमतों में भी उल्लेखनीय उछाल देखने को मिला है। रिपोर्टों के अनुसार पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एलपीजी की कीमतें 46 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी हैं।

रसोई गैस पर बढ़ता दबाव, कंपनियों की चिंता बरकरार

घरेलू एलपीजी के क्षेत्र में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। सऊदी सीपी बेंचमार्क में जनवरी से अब तक लगभग 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके चलते एक घरेलू गैस सिलेंडर की वास्तविक सप्लाई लागत बढ़कर लगभग 1600 से 1700 रुपये तक पहुंच गई है।

हाल ही में तेल कंपनियों ने घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 29 रुपये की वृद्धि की थी, लेकिन इसके बावजूद प्रत्येक सिलेंडर पर 600 से 700 रुपये तक की अंडर-रिकवरी बनी हुई बताई जा रही है। सरकारी आकलन के अनुसार घरेलू एलपीजी पर कुल अंडर-रिकवरी एक वर्ष में बढ़कर करीब 60 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा लगभग 41,338 करोड़ रुपये था।

होर्मुज जलडमरूमध्य संकट ने बढ़ाई मुश्किलें

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। देश लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल और करीब 60 प्रतिशत एलपीजी विदेशों से खरीदता है। मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने से पहले भारत के तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत और एलपीजी आयात का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आता था।

क्षेत्र में बढ़ते संकट के कारण इस समुद्री मार्ग पर जोखिम बढ़ गया है, जिससे आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई है। इस स्थिति से निपटने के लिए भारत ने तेल कंपनियों के साथ मिलकर एलपीजी आयात के स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई है। अब नए देशों और वैकल्पिक बाजारों से गैस मंगाई जा रही है, लेकिन इसके कारण परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आयात लागत और आपूर्ति चुनौतियां भविष्य में कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बना सकती हैं। यही वजह है कि 15 मई 2026 के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई बार संशोधन देखने को मिला है।

RBI ने भी जताई चिंता, विकास दर पर असर की आशंका

ऊर्जा संकट का असर केवल ईंधन कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव व्यापक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान इस विषय पर चिंता व्यक्त की थी।

आरबीआई गवर्नर ने कहा कि वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और ऊर्जा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर आर्थिक विकास और महंगाई दोनों पर पड़ सकता है। उनके अनुसार बीते दो महीनों में भारतीय बास्केट के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल रही है, जिसका असर खुदरा बाजार में दिखाई देना शुरू हो गया है।

इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। वहीं खुदरा महंगाई दर यानी सीपीआई मुद्रास्फीति के अनुमान में भी 50 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की गई है और इसे 5.1 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान जताया गया है।

सरकार द्वारा अतिरिक्त वित्तीय सहायता रोकने और तेल कंपनियों पर बढ़ते घाटे के दबाव को देखते हुए आने वाले महीनों में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों को लेकर बाजार की नजरें बनी रहेंगी। फिलहाल किसी नई वृद्धि की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए आगे कीमतों में बदलाव की संभावना को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता।