खुद को CM बताकर अभिजीत दीपके ने दिया इस्तीफा, अब FIR की होने लगी मांग

मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत का मामला लगातार चर्चा में है। इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके का एक बयान सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है। बालाघाट का दौरा करने के दौरान दीपके ने खुद को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बताते हुए इस्तीफा देने की बात कही। हालांकि यह कोई वास्तविक इस्तीफा नहीं था, बल्कि सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठाने के लिए दिया गया व्यंग्यात्मक बयान था।

दीपके ने बालाघाट में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत के मुद्दे को लेकर राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि वह मुख्यमंत्री होते और उनके कार्यकाल में ऐसी स्थिति पैदा होती, तो वह नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ देते।

रिपोर्टों के मुताबिक, दीपके ने अपने बयान में स्वास्थ्य सुविधाओं, पीने के पानी, शिक्षा और आदिवासी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की स्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने बच्चों की मौत के बाद दिए गए मुआवजे को लेकर भी सरकार की संवेदनशीलता पर प्रश्न खड़े किए और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की।

बालाघाट पहुंचे थे दीपके

अभिजीत दीपके 12 सितंबर को बालाघाट के प्रभावित आदिवासी इलाकों में पहुंचे। उन्होंने अडोरी, कोरका और बोंदारी जैसे गांवों का दौरा किया और उन परिवारों से मुलाकात की, जिन्होंने हाल में अपने बच्चों को खोया है। उनके साथ स्थानीय युवा भी मौजूद थे।

दौरे के दौरान दीपके ने इलाके में स्वास्थ्य सुविधाओं और बच्चों की मौत के कारणों से जुड़ी जानकारी जुटाने की कोशिश की। उन्होंने प्रशासन से इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करने और प्रभावित इलाकों में बेहतर स्वास्थ्य एवं बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की।

बालाघाट में क्या हुआ है?

बालाघाट जिले के आदिवासी इलाकों में संक्रामक बीमारियों से 30 से अधिक बच्चों की मौत का मामला सामने आया है। इस मामले को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी गंभीर रुख अपनाया है।

एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य के स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, बालाघाट के कलेक्टर और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर को निर्धारित की गई है।
याचिका में क्या आरोप हैं?

याचिका में प्रभावित इलाकों की स्थिति को लेकर कई गंभीर दावे किए गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में पेश की गई ग्राउंड रिपोर्ट में कथित तौर पर दूषित पानी, पोषण की कमी, साफ-सफाई की खराब स्थिति और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का उल्लेख किया गया है।

एक रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि सीमित क्षमता वाले अस्पताल में बड़ी संख्या में बच्चों का इलाज किया जा रहा था। हालांकि इन सभी दावों को अंतिम रूप से स्थापित तथ्य के तौर पर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि मामले में हाई कोर्ट ने संबंधित सरकारी विभागों से जवाब मांगा है और न्यायिक प्रक्रिया अभी जारी है।

दीपके ने सरकार की जवाबदेही पर उठाए सवाल

बालाघाट दौरे के दौरान दीपके ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों की मौत जैसे गंभीर मामले में केवल मुआवजा देना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, पीने के पानी और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की मांग की।

उनका मुख्यमंत्री के रूप में इस्तीफा देने वाला बयान इसी संदर्भ में था। यानी दीपके वास्तव में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं और उनके बयान को सरकारी पद से वास्तविक इस्तीफा नहीं माना जा सकता। मौजूदा समय में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हैं।

बयान के बाद FIR की मांग क्यों उठी?

दीपके के इस बयान और बालाघाट दौरे से जुड़े वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ कार्रवाई और FIR की मांग करने वाले पोस्ट भी दिखाई दिए हैं। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि किसी वास्तविक संवैधानिक पद पर न होते हुए मुख्यमंत्री की भूमिका में बयान देना और प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की भाषा इस्तेमाल करना उचित है या नहीं।

हालांकि उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों में ऐसा कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं मिला है जिससे यह पुष्टि हो कि केवल इस “मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे” वाले बयान के आधार पर दीपके के खिलाफ कोई नई FIR दर्ज हो गई है। इसलिए FIR दर्ज होने की बात को फिलहाल पुष्टि किए हुए तथ्य के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि दीपके पहले भी कानूनी विवादों में रह चुके हैं। अगस्त 2026 में महाराष्ट्र के लातूर जिले में एक सरकारी स्कूल में कथित तौर पर बिना अनुमति प्रवेश करने, सरकारी काम में बाधा डालने और शिक्षकों को धमकाने के आरोप में उनके और अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज हुई थी। पुलिस मामले की जांच कर रही थी।

बालाघाट मामले में अब आगे क्या?


बालाघाट में बच्चों की मौत का मामला अब न्यायिक निगरानी के दायरे में भी आ चुका है। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार की ओर से अदालत में पेश किया जाने वाला जवाब महत्वपूर्ण होगा।

दूसरी तरफ, दीपके ने इस मामले को राजनीतिक और सामाजिक जवाबदेही के मुद्दे के तौर पर उठाया है। उनके दौरे के दौरान कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने भी उनका विरोध किया और उन पर इस त्रासदी का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। दीपके के समर्थकों और आलोचकों के बीच इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर बहस भी तेज हुई है।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बालाघाट में बच्चों की मौत का वास्तविक कारण, प्रशासन की भूमिका और स्वास्थ्य एवं बुनियादी सुविधाओं की स्थिति से जुड़े सवालों पर सरकारी जवाब और आगे की जांच का इंतजार है। वहीं, अभिजीत दीपके का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने वाला बयान वास्तविक सरकारी इस्तीफा नहीं बल्कि सरकार पर निशाना साधने वाला व्यंग्यात्मक राजनीतिक बयान है।