वर्ष 1975 में कालजयी फिल्म शोले देने के बाद निर्देशक रमेश सिप्पी की गिनती हिन्दी फिल्मों के ख्यातनाम निर्देशकों में होने लगी थी। ऐसा नहीं है उन्होंने शोले से पहले कोई सफल फिल्म नहीं दी थी। शोले से पहले उन्होंने दर्शकों को अंदाज, सीता और गीता सरीखी फिल्में दी थीं। ख्यातनाम निर्माता जी.पी. सिप्पी के पुत्र के नाते भी उनका फिल्म उद्योग में अच्छा रूतबा था। शोले की अपार सफलता के बाद उन्होंने तकनीकी दृष्टि से सुद्ढृ एक बड़ी फिल्म शान की पटकथा को अंतिम रूप दिया। उन्होंने एक बार फिर से शोले की टीम को दोहराना चाहा, विशेष रूप से नायक-नायिका के तौर उन्होंने धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी और अमिताभ बच्चन को चुना। लेकिन धर्मेन्द्र ने फिल्म में काम करने से इंकार कर दिया उसके बाद हेमा ने भी मना कर दिया। रमेश सिप्पी ने धर्मेन्द्र की भूमिका में अमिताभ और अमिताभ की भूमिका में शशि कपूर को फिट किया। हेमा मालिनी की जगह पर उन्होंने परवीन बॉबी को लिया। शशि कपूर के साथ बिंदिया गोस्वामी और खलनायक के तौर पर उन्होंने कुलभूषण खरबन्दा को पेश किया।
फिर से दोहरानी थी 'शोले' की टीम, लेकिन धर्मेन्द्र ने किया इंकाररमेश सिप्पी की योजना थी कि वे एक बार फिर शोले की मूल टीम को साथ लाएं। उन्होंने फिल्म के तीन प्रमुख किरदारों के लिए धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी और अमिताभ बच्चन को सोचा। लेकिन इस बार किस्मत ने साथ नहीं दिया।
कथित रूप से रमेश सिप्पी और धर्मेन्द्र के बीच किसी रचनात्मक मतभेद या व्यक्तिगत विवाद के कारण धर्मेन्द्र ने फिल्म करने से इनकार कर दिया। जब धर्मेन्द्र फिल्म से बाहर हुए, तो हेमा मालिनी ने भी उनका साथ छोड़ दिया और फिल्म का हिस्सा बनने से मना कर दिया।
अमिताभ बने ‘विजय’, शशि कपूर को मिला नया किरदारधर्मेन्द्र के हटने के बाद अमिताभ बच्चन को फिल्म में मुख्य किरदार विजय के रूप में लिया गया। दिलचस्प बात यह है कि पहले अमिताभ को फिल्म में रवि के किरदार के लिए सोचा गया था। लेकिन धर्मेन्द्र की अनुपस्थिति में भूमिका अदल-बदल कर दी गई और रवि का रोल शशि कपूर को दे दिया गया।
वहीं, हेमा मालिनी के स्थान पर सिप्पी ने परवीन बॉबी को लिया और शशि कपूर के अपोजिट बिंदिया गोस्वामी को कास्ट किया। फिल्म के खलनायक के रूप में रमेश सिप्पी ने एक बिल्कुल नया चेहरा पेश किया — कुलभूषण खरबन्दा, जो शाकाल के किरदार में अब तक के सबसे स्टाइलिश और तकनीकी खलनायकों में माने जाते हैं।
बॉलीवुड की अब तक की सबसे महंगी फिल्म थी ‘शान’साल 1980 में जब 'शान' रिलीज़ हुई, तो इसे अब तक की सबसे महंगी हिंदी फिल्म कहा गया। फिल्म में विदेशी लोकेशन, हाई-टेक विलेन का अड्डा, हेलीकॉप्टर एक्शन, तेज-तर्रार कैमरा मूवमेंट और डबल रोल के समीकरण दर्शकों को बड़े परदे की नई परिभाषा देने वाले थे।
फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में सुनील दत्त, अमिताभ बच्चन, शशि कपूर, बिंदिया गोस्वामी, परवीन बाबी, राखी, शत्रुघ्न सिन्हा और कुलभूषण खरबंदा जैसे कलाकार शामिल थे। इस फिल्म का स्केल इतना बड़ा था कि इसे ‘बॉलीवुड की जेम्स बॉन्ड स्टाइल’ मूवी कहा गया।
शक्तिशाली थी थीम, लेकिन पटकथा में आई कमजोरी‘शान’ की मूल कथा शोले की ही तरह प्रतिशोध और न्याय की थी, लेकिन उसका प्रस्तुतिकरण अपेक्षाकृत कमजोर रहा। कहानी दो भाइयों—विजय (अमिताभ बच्चन) और रवि (शशि कपूर)—के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने बड़े भाई (सुनील दत्त) की हत्या के बाद अपराध की दुनिया में कदम रखते हैं और अंततः अंतरराष्ट्रीय खलनायक शाकाल से टकराते हैं। शाकाल का किरदार कुलभूषण खरबंदा ने निभाया, जो अपने आधुनिक गैजेट्स और शार्क-टैंक जैसे अड्डे के कारण यादगार बन गया।
हालांकि फिल्म की सेटिंग भव्य थी और अंतरराष्ट्रीय स्तर की लग रही थी, लेकिन सलिम-जावेद की लेखनी इस बार दर्शकों को वह पकड़ नहीं दे सकी जो 'शोले' में थी। पात्रों की मनोवैज्ञानिक गहराई कमज़ोर थी, और संवादों में वह तीखापन नहीं था जिसकी दर्शक अपेक्षा कर रहे थे। फिल्म की लंबाई और कुछ दृश्यों की दोहरावभरी प्रकृति ने भी दर्शकों के धैर्य की परीक्षा ली। कुल मिलाकर, फिल्म की स्क्रिप्ट एक बड़े बजट की मांगों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पाई।
संगीत ने बनाया माहौल, लेकिन एडिटिंग रही ढीली‘शान’ का संगीत भी उस दौर की बड़ी फिल्मों की तरह भव्य और लोकप्रिय था। आर. डी. बर्मन द्वारा रचित इस फिल्म का संगीत आज भी याद किया जाता है। खासकर “प्यार करने वाले कभी डरते नहीं” और “यम्मा यम्मा” जैसे गीत युवाओं में काफी लोकप्रिय हुए। किशोर कुमार, मोहम्मद रफी और आशा भोंसले जैसे गायकों की आवाज़ों ने गीतों को और ऊंचाई दी। गीतों की कोरियोग्राफी और सिनेमाटोग्राफी भी उस समय के हिसाब से आकर्षक और स्टाइलिश मानी गई।
हालांकि जहां संगीत ने फिल्म की गति को बनाए रखने की कोशिश की, वहीं एडिटिंग ने कहानी को धीमा बना दिया। एम. एस. शिंदे द्वारा की गई एडिटिंग फिल्म की लंबाई पर नियंत्रण नहीं रख सकी। कई दृश्यों में गति की कमी और बेवजह विस्तार ने दर्शकों को थका दिया। खासकर दूसरे हाफ में फिल्म की गति टूटती नजर आती है, जो इसकी असफलता के प्रमुख कारणों में से एक रही। एडिटिंग अगर और कसी हुई होती तो फिल्म की सिनेमाई शक्ति कहीं अधिक प्रभावशाली बन सकती थी।
टाइटल सॉन्ग बना फिल्म की सबसे स्टाइलिश ओपनिंग, ऊषा उथुप और पद्मिनी कपिला की जुगलबंदी से चमकाफिल्म ‘शान’ की शुरुआत जिस गीत से होती है, वह टाइटल सॉन्ग “शान से...” है, जिसे ऊषा उथुप ने अपनी गहरी, दमदार और अद्वितीय आवाज़ में गाया था। यह गीत फिल्म की नामावली (Opening Credits) के दौरान आता है, और इसे पद्मिनी कपिला पर फिल्माया गया है, जो सिगरेट के कश लेते हुए और आत्मविश्वास से भरपूर नृत्य करती नज़र आती हैं। यह गीत अपने समय से कई साल आगे माना गया, जिसमें आधुनिक डिस्को बीट्स, वेस्टर्न वेशभूषा और नाइट क्लब जैसी रोशनी का प्रयोग किया गया।
फिल्म के क्रेडिट्स इस गीत के बीच ही सामने आते हैं, और यहीं से दर्शकों को यह आभास हो जाता है कि वे एक तकनीकी रूप से उन्नत और ग्लैमर से भरपूर फिल्म देखने जा रहे हैं। ऊषा उथुप की आवाज़, आर.डी. बर्मन की संगत और पद्मिनी कपिला के आत्मविश्वासी स्टाइल ने मिलकर ‘शान’ को बॉलीवुड की सबसे प्रभावशाली ओपनिंग देने वाली फिल्मों में स्थान दिलाया। यह गाना सिर्फ एक म्यूजिकल ट्रैक नहीं था, बल्कि फिल्म की ‘शान’ और उसकी शैली का घोषणापत्र था।
रिलीज के बाद दर्शकों से नहीं मिला वैसा प्यारलेकिन सारी उम्मीदों और भारी प्रचार-प्रसार के बावजूद, ‘शान’ रिलीज़ के समय बुरी तरह फ्लॉप हो गई। दर्शकों ने न तो कहानी से जुड़ाव महसूस किया और न ही किरदारों में वह गहराई मिली जो शोले में थी।
फिल्म में राखी, अमिताभ की भाभी बनी थीं, जबकि इससे पहले वे उनकी प्रेमिका के रूप में कई फिल्मों में दिख चुकी थीं। यह भी दर्शकों को असहज लगा। हालांकि, गीत-संगीत और कुछ दृश्य जैसे प्यार करने वाले कभी डरते नहीं... लंबे समय तक लोकप्रिय रहे।
समय के साथ बनी कल्ट क्लासिकहालांकि शुरुआत में फिल्म फ्लॉप हो गई, लेकिन समय के साथ शान ने ‘कल्ट क्लासिक’ का दर्जा हासिल कर लिया। खासतौर पर 1990 के दशक और 2000 के बाद जब टेलीविजन और डिजिटल माध्यम से फिल्में फिर देखी जाने लगीं, ‘शान’ के एक्शन, शाकाल का विलेन किरदार और तकनीकी मजबूती को सराहा गया।
इस फिल्म को उन फिल्मों में गिना गया जो अपने समय से काफी आगे थीं, इसलिए दर्शकों ने उन्हें शुरू में समझ नहीं पाया।
धर्मेन्द्र-हेमा का ‘ना’, अमिताभ का ‘हां’, लेकिन सफलता का ‘नहीं’‘शान’ हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों में से एक है, जो बेहद महत्वाकांक्षी थी। इसमें सब कुछ था— बड़े सितारे, बजट, तकनीक, संगीत, लोकेशन और निर्देशन। फिर भी यह बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी का स्वाद नहीं चख सकी।
धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी का फिल्म से पीछे हटना एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। अमिताभ बच्चन ने अपनी ओर से पूरी मेहनत की, लेकिन स्क्रिप्ट की कमजोरी और दर्शकों की अपेक्षाएं शायद कुछ और चाहती थीं।
फिर भी, ‘शान’ एक ऐसा अध्याय बन गई जो बताती है कि सफलता और असफलता के बीच सिर्फ स्टारडम ही नहीं, कहानी और भावनाओं की पकड़ भी जरूरी होती है।