‘टॉक्सिक’ की असफलता: कमजोर कथानक को ढक नहीं पाई सितारे की चमक, KGF की छाया से बाहर नहीं आए यश

—राजेश कुमार भगताणी

सिनेमा में किसी फिल्म की सफलता जितनी चर्चा पैदा करती है, उसकी असफलता उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है। सफल फिल्म के साथ अक्सर उसके सितारे, कमाई और रिकॉर्ड की चर्चा होती है, लेकिन असफल फिल्म हमें यह सोचने का अवसर देती है कि आखिर दर्शक ने उसे क्यों नकार दिया। यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक’ को भी इसी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। यह केवल एक बड़े सितारे की फिल्म की अपेक्षाओं के अनुरूप प्रदर्शन न कर पाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस दौर के भारतीय सिनेमा का आईना भी है, जिसमें बड़े बजट, विशाल प्रचार, पैन इंडिया छवि और सितारों के स्टारडम को सफलता का लगभग निश्चित सूत्र मान लिया गया है। ‘टॉक्सिक’ ने एक बार फिर याद दिलाया है कि दर्शक को सिनेमाघर तक खींचने के लिए स्टार पर्याप्त हो सकता है, लेकिन उसे फिल्म से जोड़कर रखने के लिए कहानी का मजबूत होना जरूरी है।

‘केजीएफ’ के बाद यश के सामने सबसे बड़ी चुनौती

यश की सबसे बड़ी ताकत उनकी लोकप्रियता है, लेकिन ‘टॉक्सिक’ के मामले में यही लोकप्रियता एक बड़ी चुनौती भी बन गई। ‘केजीएफ’ ने यश को केवल एक सफल अभिनेता नहीं बनाया, बल्कि उन्हें देशभर में एक विशिष्ट सिनेमाई पहचान दी। रॉकी का किरदार दर्शकों के मन में इस तरह बैठा कि यश की अगली फिल्म से स्वाभाविक रूप से ‘केजीएफ’ जैसी ऊर्जा, प्रभाव और भव्यता की उम्मीद की जाने लगी। यही वह स्थिति थी, जिसमें ‘टॉक्सिक’ को अपने लिए एक अलग रास्ता बनाना था।

किसी अभिनेता की बहुत बड़ी सफलता के बाद उसकी अगली फिल्म के सामने सबसे कठिन चुनौती यह होती है कि वह पुरानी सफलता की नकल किए बिना दर्शक की अपेक्षाओं को कैसे पूरा करे। दर्शक नई कहानी देखने आता है, लेकिन अपने मन में पिछली फिल्म की स्मृतियां लेकर आता है। यश के साथ भी यही हुआ। ‘टॉक्सिक’ को केवल एक अच्छी फिल्म नहीं होना था, उसे ‘केजीएफ’ की छाया से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनानी थी। फिल्म इस चुनौती को पूरी तरह पार नहीं कर सकी, तो इसका असर दर्शकों की प्रतिक्रिया पर पड़ना स्वाभाविक था।

विशालता और गुणवत्ता में अंतर

भारतीय सिनेमा में पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसी धारणा मजबूत हुई है कि बड़ी फिल्म वही है, जिसका बजट बड़ा हो, जिसमें महंगे दृश्य हों, बड़े सितारे हों और जिसे कई भाषाओं में रिलीज किया जाए। लेकिन सिनेमा का सबसे पुराना और सबसे विश्वसनीय सत्य इससे अलग है—बजट फिल्म को बड़ा बना सकता है, कहानी ही उसे यादगार बनाती है।

दर्शक सिनेमाघर में यह देखने नहीं जाता कि फिल्म पर कितने करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी दृश्य को बनाने में कितनी तकनीक लगी। वह केवल यह महसूस करता है कि पर्दे पर चल रही कहानी उसे अपने साथ लेकर जा रही है या नहीं। ‘टॉक्सिक’ की सबसे बड़ी आलोचनाओं में कहानी, पटकथा और गति से जुड़े सवाल सामने आए। यश की उपस्थिति और फिल्म की दृश्य भव्यता के बावजूद यदि दर्शक भावनात्मक रूप से कहानी से नहीं जुड़ पाया, तो फिल्म की सारी विशालता धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाती है।

सिनेमा में सबसे महंगा दृश्य भी उस एक साधारण दृश्य से हार सकता है, जिसमें दर्शक अपने जीवन की कोई भावना पहचान ले। इसलिए फिल्मकारों को यह समझना होगा कि दर्शक को चकाचौंध से कुछ समय के लिए प्रभावित किया जा सकता है, लेकिन लंबे समय तक बांधे रखने के लिए कहानी चाहिए।

‘पैन इंडिया’ का अर्थ केवल कई भाषाओं में रिलीज नहीं


‘पैन इंडिया’ आज भारतीय फिल्म उद्योग का सबसे लोकप्रिय शब्द है, लेकिन इसकी वास्तविक भावना को समझना अभी भी जरूरी है। किसी फिल्म को कई भाषाओं में रिलीज कर देना उसे पैन इंडिया फिल्म नहीं बना देता। पैन इंडिया वह फिल्म होती है, जिसकी कहानी और भावनाएं भाषाई तथा भौगोलिक सीमाओं को पार कर सकें।

‘केजीएफ’ की सफलता का कारण केवल उसकी बहुभाषी रिलीज नहीं थी। उसके भीतर संघर्ष, महत्वाकांक्षा, सत्ता और गरीबी से निकलकर ऊपर उठने की ऐसी कहानी थी, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों के दर्शक अपनी तरह से समझ सकते थे। इसके विपरीत यदि किसी फिल्म की मूल कहानी दर्शक को भावनात्मक रूप से पकड़ने में असफल हो जाए, तो भाषा बदलने से उसका प्रभाव नहीं बदलता।

आज का दर्शक पहले से कहीं अधिक समझदार और विकल्पों से भरा हुआ है। वह हिंदी के साथ दक्षिण भारतीय भाषाओं का सिनेमा देखता है, विदेशी फिल्में और धारावाहिक देखता है और अलग-अलग तरह की कहानियों की तुलना करता है। इसलिए अब केवल बड़े सितारे और बड़े पैमाने का सिनेमा उसके लिए पर्याप्त नहीं है। वह यह पूछता है कि इस फिल्म में ऐसा क्या है, जो मुझे दूसरी फिल्मों में नहीं मिलेगा।

असली संकट कहानी और दर्शक के बीच का रिश्ता


‘टॉक्सिक’ के मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या फिल्म अपने पात्रों और उनकी दुनिया के साथ दर्शक का पर्याप्त भावनात्मक रिश्ता बना सकी। सिनेमा में कहानी कितनी भी जटिल क्यों न हो, दर्शक को किसी न किसी स्तर पर उसके पात्रों के साथ चलना होता है। वह उनके संघर्ष को महसूस करना चाहता है, उनकी जीत से खुश होना चाहता है और उनकी हार से दुखी होना चाहता है।

कहानी को रहस्यमय बना देना उसे गहरा नहीं बनाता और कहानी को अंधेरा बना देना उसे गंभीर नहीं बनाता। गहराई तब पैदा होती है, जब किसी पात्र के भीतर का संघर्ष दर्शक के भीतर भी कुछ हलचल पैदा करे। जटिलता और गहराई के बीच यही अंतर है। कई बार फिल्मकार यह मान लेते हैं कि यदि दर्शक को सब कुछ तुरंत समझ में नहीं आया तो फिल्म बहुत गहरी है। लेकिन दर्शक को सोचने पर मजबूर करना और उसे उलझा देना दो अलग बातें हैं।

‘टॉक्सिक’ की महत्वाकांक्षा निश्चित रूप से सामान्य मनोरंजन से अलग अनुभव देने की रही होगी, लेकिन बड़ी महत्वाकांक्षा तभी सफल होती है, जब उसके पीछे उतनी ही मजबूत पटकथा खड़ी हो।

वर्षों की प्रतीक्षा ने बढ़ाई उम्मीदें

‘टॉक्सिक’ की एक और समस्या उसकी अपनी बनाई हुई उम्मीदें थीं। यश की पिछली बड़ी सफलता के बाद दर्शक लंबे समय तक उनकी अगली फिल्म की प्रतीक्षा करता रहा। यह प्रतीक्षा जितनी लंबी होती गई, फिल्म को लेकर उम्मीदें भी उतनी ही बढ़ती गईं। अब दर्शक केवल एक फिल्म देखने नहीं जा रहा था, वह एक बड़े सिनेमाई अनुभव की उम्मीद कर रहा था। यहीं से फिल्म के लिए खतरा पैदा होता है। जब प्रचार किसी फिल्म को एक असाधारण घटना के रूप में प्रस्तुत करता है, तो दर्शक भी उससे सामान्य मनोरंजन से कहीं अधिक की अपेक्षा करता है। यदि पर्दे पर मिला अनुभव उन उम्मीदों के स्तर तक नहीं पहुंचता, तो निराशा भी उतनी ही बड़ी होती है। इसलिए किसी फिल्म की असफलता हमेशा उसकी वास्तविक गुणवत्ता का सीधा परिणाम नहीं होती। कई बार वह अपेक्षा और अनुभव के बीच पैदा हुई दूरी का परिणाम भी होती है। ‘टॉक्सिक’ के साथ इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

केवल शुरुआत करा सकता है स्टारडम

यश का स्टारडम आज भी मजबूत है और ‘टॉक्सिक’ की शुरुआती प्रतिक्रिया ने इसे साबित भी किया। लेकिन फिल्म की आगे की यात्रा ने एक दूसरी सच्चाई सामने रखी—स्टारडम दर्शक को टिकट खरीदने के लिए प्रेरित कर सकता है, लेकिन फिल्म देखने के बाद उसकी प्रतिक्रिया कहानी तय करती है।

आज का दर्शक किसी अभिनेता से प्रेम कर सकता है, लेकिन उसकी हर फिल्म को स्वीकार करना उसके लिए जरूरी नहीं है। वह अभिनेता और फिल्म के बीच अंतर करना सीख चुका है। यही कारण है कि किसी बड़े सितारे की फिल्म भी कमजोर कहानी के कारण असफल हो सकती है, जबकि अपेक्षाकृत छोटे बजट की फिल्म (उदाहरण के तौर पर हनुमान अंश) अच्छी कहानी के दम पर बड़ी सफलता हासिल कर सकती है।

सिनेमा में सबसे प्रभावशाली प्रचार अभी भी दर्शक की जुबान है। यदि दर्शक फिल्म देखकर बाहर निकलता है और दूसरों से कहता है कि इसे जरूर देखना चाहिए, तो फिल्म का वास्तविक प्रचार शुरू होता है। लेकिन यदि वही दर्शक निराश होकर बाहर आता है, तो महंगा प्रचार अभियान भी लंबे समय तक फिल्म को नहीं बचा सकता।

असफलता यश का अंत नहीं, जरूरी संकेत है

‘टॉक्सिक’ की असफलता को यश के स्टारडम के अंत के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। किसी भी बड़े कलाकार के करियर में ऐसी फिल्में आती हैं, जो अपेक्षाओं के अनुरूप प्रदर्शन नहीं करतीं। महत्वपूर्ण यह होता है कि कलाकार उस असफलता से क्या सीखता है। यश के पास आज भी वह लोकप्रियता है, जो किसी फिल्म को बड़े स्तर पर दर्शकों तक पहुंचा सकती है। लेकिन ‘टॉक्सिक’ ने यह संकेत जरूर दिया है कि अब केवल विशालता पर्याप्त नहीं होगी। अगली फिल्म में उन्हें ऐसी कहानी चुननी होगी, जो उनके स्टारडम का इस्तेमाल करे, लेकिन उस पर निर्भर न रहे।

हर बड़े कलाकार के आसपास ऐसे लोग होना जरूरी है, जो आवश्यकता पड़ने पर असहमति जताने का साहस रखते हों। सफलता के समय सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है, जब हर व्यक्ति केवल यह कहने लगे कि सब कुछ शानदार है। एक मजबूत रचनात्मक टीम वही है, जो अभिनेता को उसकी कमजोरियां भी दिखा सके।

‘टॉक्सिक’ का सबसे बड़ा सबक

‘टॉक्सिक’ की असफलता को केवल एक फिल्म की हार मान लेना शायद इसके सबसे महत्वपूर्ण पक्ष को नजरअंदाज करना होगा। यह भारतीय सिनेमा के लिए एक जरूरी चेतावनी है कि दर्शक अब केवल सितारों की चमक से संतुष्ट नहीं होगा। वह बड़े पर्दे पर बड़ा अनुभव जरूर चाहता है, लेकिन उस अनुभव की नींव कहानी में ही होगी। तकनीक बदल सकती है, बजट बढ़ सकता है, प्रचार के तरीके बदल सकते हैं और फिल्मों का पैमाना पहले से कहीं विशाल हो सकता है, लेकिन सिनेमा की मूल जरूरत नहीं बदलेगी। दर्शक कहानी चाहता है, भावनात्मक जुड़ाव चाहता है और ऐसा अनुभव चाहता है जो सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद भी उसके भीतर कुछ देर तक जीवित रहे।

शायद यही ‘टॉक्सिक’ की असफलता का सबसे बड़ा संदेश है। सितारा दर्शक को सिनेमाघर तक ला सकता है, लेकिन कहानी ही उसे सीट पर बनाए रखती है। प्रचार उत्सुकता पैदा कर सकता है, लेकिन दर्शक की प्रतिक्रिया ही फिल्म का भविष्य तय करती है। विशाल बजट पर्दे को भव्य बना सकता है, लेकिन वह कहानी में जान नहीं डाल सकता।

यश का स्टारडम खत्म नहीं हुआ है, लेकिन ‘टॉक्सिक’ ने यह जरूर बता दिया है कि अब उनके सामने केवल एक और बड़ी फिल्म बनाने की चुनौती नहीं है। उन्हें ऐसी फिल्म बनाने की जरूरत है, जो बड़ी होने के साथ-साथ भीतर से भी मजबूत हो। क्योंकि दर्शक अब यह नहीं पूछता कि फिल्म कितनी महंगी है, कितनी भाषाओं में बनी है या उसमें कितने बड़े सितारे हैं। वह अंततः केवल एक सवाल पूछता है—फिल्म ने मुझे महसूस क्या कराया?

यही सवाल किसी भी फिल्म की अंतिम कसौटी है और शायद ‘टॉक्सिक’ इसी कसौटी पर अपनी सबसे बड़ी परीक्षा में पीछे रह गई।