कन्हैया लाल हत्याकांड पर आधारित बहुचर्चित फिल्म 'उदयपुर फाइल्स' की रिलीज़ पर दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा लगाई गई अस्थायी रोक के खिलाफ अब सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा। फिल्म निर्माता अमित जानी की ओर से दाखिल याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने सहमति जताई है और मौखिक रूप से यह कहा है कि मामला दो-तीन दिन में सूचीबद्ध किया जाएगा।
हाई कोर्ट ने क्यों लगाई थी रोक?'उदयपुर फाइल्स' फिल्म की रिलीज़ 11 जुलाई को तय थी, लेकिन इससे ठीक एक दिन पहले 10 जुलाई को दिल्ली हाई कोर्ट ने फिल्म पर रोक लगा दी थी। यह रोक सिनेमेटोग्राफ एक्ट, 1952 की धारा 6 के तहत लगाई गई थी, जिसके तहत सरकार को यह अधिकार है कि वह किसी फिल्म की समीक्षा कर सकती है अगर उसे लगता है कि यह सार्वजनिक शांति या सद्भाव को प्रभावित कर सकती है।
हाई कोर्ट में यह मामला तीन याचिकाओं के आधार पर उठा था, जिनमें से एक याचिका जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी की थी। इन याचिकाओं में आशंका जताई गई थी कि फिल्म का कथानक और चित्रण सांप्रदायिक भावनाएं भड़का सकता है और समाज में अशांति फैला सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?फिल्म निर्माता अमित जानी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया और वकील पुलकित अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। उन्होंने कोर्ट से मांग की कि दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को रद्द किया जाए और फिल्म को रिलीज़ की अनुमति दी जाए। उन्होंने कहा कि उनकी याचिका संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत दाखिल की गई है, जो सुप्रीम कोर्ट को विशेष अपील सुनने का अधिकार देता है।
वकील पुलकित अग्रवाल ने मीडिया से कहा, हमने मांग की है कि फिल्म पर लगी अस्थायी रोक हटाई जाए। हम हाई कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं लेकिन हमें लगता है कि यह निर्णय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और रचनात्मक स्वतंत्रता के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को प्राथमिकता देते हुए मौखिक रूप से सुनवाई के लिए दो से तीन दिन में सूचीबद्ध करने की बात कही है।
क्या है 'उदयपुर फाइल्स'?यह फिल्म 28 जून 2022 को राजस्थान के उदयपुर में हुए कन्हैया लाल हत्याकांड पर आधारित है। कन्हैया लाल एक दर्जी थे, जिनकी दुकान में ही दो मुस्लिम युवकों—मोहम्मद रियाज़ अत्तारी और गौस मोहम्मद—ने दिनदहाड़े गला रेतकर हत्या कर दी थी। इस वीभत्स हत्या का वीडियो भी बनाया गया था, जिसे सोशल मीडिया पर वायरल किया गया था।
इस फिल्म का उद्देश्य, निर्माता के अनुसार, सच्चाई को सामने लाना है, लेकिन विरोधी पक्ष इसे 'सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने वाली फिल्म' मानते हैं।
अभिव्यक्ति बनाम सामाजिक जिम्मेदारीयह मामला सिर्फ एक फिल्म की रिलीज़ का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन का भी है। एक ओर फिल्म निर्माता का दावा है कि उन्होंने सत्य घटनाओं को चित्रित किया है, वहीं याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस चित्रण से एक विशेष समुदाय के खिलाफ भावनाएं भड़क सकती हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ सकता है।
अब यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत के सामने है, जो तय करेगी कि क्या 'उदयपुर फाइल्स' जैसी संवेदनशील विषयवस्तु पर आधारित फिल्म को रिलीज़ की अनुमति दी जा सकती है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल फिल्म के भविष्य पर असर डालेगा, बल्कि देश में रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी की सीमाओं को परिभाषित करने वाला एक अहम कानूनी उदाहरण भी बनेगा।