शिल्पा शेट्टी ने बताया क्यों 90 का दशक था बॉलीवुड का 'गोल्डन एरा', बोलीं- तब हम जी सकते थे

बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी आज भले ही योग और फिटनेस की आइकॉन बन चुकी हों, लेकिन उनका दिल अब भी उन गुज़रे ज़माने की फिल्मों में धड़कता है, जिसने उन्हें स्टार बनाया। हाल ही में फेमिना को दिए इंटरव्यू में शिल्पा ने 90 के दशक को बॉलीवुड का गोल्डन एरा बताया और बताया कि वो दौर कितना बेफिक्र और आत्मीय था।

हम तब जी सकते थे — शिल्पा की 90s की यादें

शिल्पा शेट्टी ने 90s को अपना पसंदीदा समय बताते हुए कहा, “वो समय सोने जैसा था। हम सुबह तक को-स्टार्स के साथ ताश खेलते थे, लोकेशन पर साथ में बिरयानी खाते थे और खुलकर हंसते थे—बिना इस डर के कि कोई पैपराज़ी हमें कैमरे में कैद कर लेगा। हम वाकई जी सकते थे।” उनकी इस बात से साफ झलकता है कि तब के बॉलीवुड में इंसानी जुड़ाव और रचनात्मक आज़ादी ज़्यादा थी।

मात्रा नहीं, गहराई चाहिए— बदलते समय में बदला चयन

2000 के बाद, शिल्पा ने अपनी फिल्मी प्राथमिकताओं में बदलाव किया। जब उनके कई समकालीन कलाकार संख्या में काम करने की होड़ में लगे थे, शिल्पा ने चुना गुणवत्ता और अर्थपूर्ण भूमिकाएं। उन्होंने कहा, “मैं केवल वही प्रोजेक्ट चुनती हूं जो मेरे बच्चों को पीछे छोड़ने लायक हों।” गौरतलब है कि वे 2012 में बेटे वियान और 2020 में बेटी समीशा की मां बनीं।
फिर मिलेंगे— वो भूमिका जिसने बदल दी सोच

शिल्पा ने फिल्म 'फिर मिलेंगे' को याद करते हुए बताया कि कैसे HIV पॉजिटिव वकील की भूमिका निभाना उनके लिए भावनात्मक रूप से बेहद भारी था। उन्होंने कहा, “मैं एक सीन के बाद अपने कमरे में बैठकर फूट-फूट कर रोई... मैं बहुत देर तक खुद को संभाल नहीं पाई।” इस भूमिका से इतनी प्रभावित होकर शिल्पा ने फिल्म से मिली अपनी कमाई AIDS चैरिटीज को दान कर दी थी।

मैं मिथ नहीं, मिशन हूं— एक असली जेमिनी की सोच


अपने व्यक्तित्व को लेकर शिल्पा ने कहा, “मैं जेमिनी हूं, और मुझे इस पर गर्व है। मैं ठहरना नहीं चाहती, मुझे गति और परफेक्शन चाहिए।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे औसतपन (mediocrity) को नहीं अपनातीं, बल्कि हर काम में अपना शत-प्रतिशत देने की कोशिश करती हैं।

शिल्पा शेट्टी का यह इंटरव्यू न सिर्फ उनकी फिल्मी यात्रा को दर्शाता है बल्कि यह भी बताता है कि कैसे एक स्टार वक्त के साथ खुद को बदलते हुए अपनी पहचान बनाए रख सकता है। 90 का दशक उनके लिए सिर्फ फिल्मों का समय नहीं था, बल्कि वह मानव जुड़ाव, सरलता और रचनात्मकता का प्रतीक था — एक दौर जिसे वह आज भी बेहद प्यार से याद करती हैं।