बॉलीवुड अभिनेत्री लीजा रे ने अपने करियर की शुरुआत मॉडलिंग की दुनिया से की थी। कैमरे के सामने उनका आत्मविश्वास और अलग पहचान जल्द ही लोगों की नजरों में आ गई। साल 1994 में फिल्म ‘हंसते खेलते’ से उन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम रखा और इसके बाद वह कई चर्चित और सफल फिल्मों का हिस्सा बनीं। ‘कसूर’, ‘बॉलीवुड/हॉलीवुड’ और ऑस्कर नामांकित फिल्म ‘वॉटर’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को सराहा गया। ग्लैमर और मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस के चलते वह तेजी से इंडस्ट्री में अपनी जगह बना रही थीं।
लेकिन साल 2001 में, जब उनका करियर शिखर पर था, उन्होंने अचानक बॉलीवुड से दूरी बना ली। उस दौर में यह फैसला कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था। अब करीब 25 साल बाद, लीजा रे ने एक इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए अपने इस फैसले के पीछे छिपी सच्चाई को पहली बार खुलकर सामने रखा है।
आखिर क्यों बनाया बॉलीवुड से फासला?लीजा रे ने अपने पोस्ट में बताया कि वह खुद को उस छवि में कैद महसूस करने लगी थीं, जो इंडस्ट्री ने उनके लिए तय कर दी थी। उन्होंने लिखा कि 2001 में भारत में शोहरत से दूर जाने का फैसला उन्होंने किसी मजबूरी में नहीं लिया था। काम की कमी नहीं थी, बल्कि ऑफर्स की भरमार थी। कई हिट फिल्मों का हिस्सा बनने के बाद भी उन्हें यह साफ महसूस होने लगा था कि लोग उन्हें सिर्फ एक खूबसूरत मॉडल या ग्लैमरस चेहरे के तौर पर देख रहे हैं।
लीजा के मुताबिक, उनकी असली पहचान, विचार और आवाज उस चमक-दमक के पीछे कहीं दबती जा रही थी। वह ऐसी भूमिकाओं में खुद को नहीं देख पा रही थीं, जो उनके भीतर की गहराई को सामने ला सकें। यही एहसास धीरे-धीरे उनके लिए बोझ बन गया और उन्होंने खुद से दूरी मिटाने के लिए इंडस्ट्री से दूरी चुन ली।
लंदन में आत्म-खोज का सफरबॉलीवुड से ब्रेक लेने के बाद लीजा रे लंदन चली गईं। वहां उन्होंने एक कॉलेज में रहकर शेक्सपियर, कविता और साहित्य का अध्ययन किया। उनका समय म्यूजियम, कला दीर्घाओं और किताबों के बीच बीता। इस दौरान उन्होंने बौद्ध धर्म और योग के दर्शन को भी करीब से समझा।
लीजा ने बताया कि उस दौर में उन्होंने खुद को लोगों की नजरों से देखने के बजाय सीखने और भीतर झांकने का रास्ता चुना। वह एक ऐसी जिंदगी चाहती थीं, जो जिज्ञासा, आत्मा और अनुभवों से जुड़ी हो, न कि सिर्फ दिखावे और बाहरी पहचान से।
इंडिपेंडेंट सिनेमा की ओर कदमआत्म-खोज के इस लंबे सफर के बाद लीजा रे ने स्वतंत्र सिनेमा की ओर रुख किया। उन्होंने बताया कि उस समय इंडिपेंडेंट फिल्में कम बजट में बनती थीं, लेकिन उनका उद्देश्य कभी सिर्फ आर्थिक सफलता नहीं था। उनके लिए फिल्में बनाना खुद को समझने और नए पहलुओं को खोजने का जरिया था।
उन्होंने हल्की-फुल्की कहानियों से लेकर गंभीर विषयों तक पर काम किया। हर किरदार के साथ वह अपने भीतर कुछ नया खोजती रहीं और अभिनय के जरिए खुद से संवाद करती रहीं। यह सफर उनके लिए एक कलाकार के रूप में दोबारा खुद को गढ़ने जैसा था।
फेम नहीं, अर्थ की तलाश थी मकसदअपनी पुरानी तस्वीरों और फिल्मों को याद करते हुए लीजा रे ने कहा कि वे भले ही उन्हें बीते दौर की सुंदरता की याद दिलाती हों, लेकिन उनका असली लक्ष्य कभी सिर्फ मशहूर होना या खूबसूरत दिखना नहीं था। उनके लिए जीवन में गहराई, अर्थ और सच्चाई की तलाश ज्यादा अहम थी।
लीजा का कहना है कि समय ने उन्हें खत्म नहीं किया, बल्कि उनके असली स्वरूप को और साफ किया। यह पूरी यात्रा उनके लिए खुद को समझने, स्वीकारने और अपनी शर्तों पर जीने का अनुभव बन गई।