स्वर कोकिला लता मंगेशकर अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ और गाने आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसे हुए हैं। चाहे 80 और 90 के दशक की धुनें हों या मॉडर्न सिनेमा के गीत, उनकी जादुई आवाज़ हर दौर में अमर रही है। साल 2006 में आई एक फिल्म के लिए भी उन्होंने ए.आर. रहमान के साथ मिलकर एक यादगार गीत गाया था, जो आज भी उनके बेहतरीन गानों में शुमार है।
रंग दे बसंती का 'लुका छुप्पी' और लता जी की मेहनत
आमिर खान की फिल्म 'रंग दे बसंती' न सिर्फ अपनी दमदार कहानी बल्कि बेहतरीन संगीत के लिए भी जानी जाती है। फिल्म का गीत 'लुका छुप्पी' जब भी बजता है, लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस गाने को रिकॉर्ड करने के लिए लता मंगेशकर ने कितनी मेहनत की थी?
इस गीत की रिकॉर्डिंग के दिन लता जी पूरे आठ घंटे तक स्टूडियो में खड़ी रहीं। इसकी जानकारी खुद फिल्म के निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने एक इंटरव्यू में दी थी। उन्होंने बताया कि लता जी ने इस गाने की तैयारी के लिए कई दिनों तक लगातार रिहर्सल की थी, ताकि गीत की भावनात्मक गहराई को सही तरह से व्यक्त किया जा सके। 'लुका छुप्पी' गीत को ए.आर. रहमान ने कंपोज किया था और इसके बोल प्रसून जोशी ने लिखे थे। खास बात यह थी कि इस गीत के कुछ हिस्सों को लता मंगेशकर और ए.आर. रहमान ने साथ मिलकर गाया था। यह गाना मां-बेटे के रिश्ते की भावनाओं को गहराई से छूता है और आज भी इसे सुनते ही भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ता है।
8 घंटे तक बिना रुके की रिहर्सलफिल्म रंग दे बसंती के दिल छू लेने वाले गीत 'लुका छुप्पी' को गाने के लिए लता मंगेशकर ने जिस समर्पण और मेहनत का परिचय दिया, वह अविस्मरणीय है। फिल्म के निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने इस किस्से को साझा करते हुए बताया था कि गाने की रिकॉर्डिंग 15 नवंबर को होनी थी, लेकिन लता मंगेशकर 9-10 नवंबर को ही चेन्नई पहुंच गई थीं। पहले तो सभी को लगा कि शायद वह किसी अन्य काम से आई हैं, लेकिन बाद में पता चला कि वह सिर्फ इस गाने की तैयारी के लिए इतनी पहले आ गई थीं। लता मंगेशकर के लिए संगीत में ज़रा भी समझौते की जगह नहीं थी। वह चाहती थीं कि गाने की भावना को पूरी तरह आत्मसात कर लें, इसलिए उन्होंने रोज़ स्टूडियो में घंटों इस गाने की रिहर्सल की। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने बताया कि रिकॉर्डिंग के दिन उन्होंने लता जी के लिए पानी, खाना और एक कुर्सी रखवाई थी, ताकि वह आराम से बैठकर गा सकें। लेकिन लता जी ने कुछ भी नहीं लिया और लगातार 8 घंटे तक खड़ी होकर रिहर्सल करती रहीं। उनकी यह निष्ठा और मेहनत ही थी जिसने 'लुका छुप्पी' जैसे भावनात्मक गीत को और भी यादगार बना दिया। यही कारण है कि यह गाना आज भी सुनने वालों की आंखें नम कर देता है। लता मंगेशकर का यह समर्पण संगीत प्रेमियों के लिए हमेशा प्रेरणा बना रहेगा।