स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपने करियर में हजारों यादगार गीत गाए, लेकिन कुछ गानों का उनके जीवन से ऐसा भावनात्मक और ऐतिहासिक जुड़ाव रहा, जिसने उन्हें हमेशा के लिए अमर बना दिया। ऐसा ही एक गीत था कहीं दीप जले कहीं दिल, जिसने न केवल संगीत प्रेमियों के दिलों में खास जगह बनाई, बल्कि लता मंगेशकर के करियर में भी एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। दिलचस्प बात यह है कि यह गीत उस दौर के बाद रिकॉर्ड किया गया था, जब लता जी लगभग एक वर्ष तक गायन से दूर रहीं और उनकी आवाज़ को लेकर गंभीर चिंता पैदा हो गई थी।
साल 1962 में रिलीज हुई फिल्म 'बीस साल बाद' का यह मशहूर गीत आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे रहस्यमयी और सिहरन पैदा करने वाले गानों में गिना जाता है। जब भी यह गीत रेडियो, टेलीविजन या किसी संगीत कार्यक्रम में बजता है, इसकी धुन और लता जी की आवाज़ श्रोताओं को एक अलग ही दुनिया में ले जाती है। इस गीत ने उन्हें न केवल जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई, बल्कि प्रतिष्ठित फिल्मफेयर पुरस्कार भी दिलवाया।
जब आवाज़ ने दिया साथ छोड़ने का संकेतबहुत कम लोग जानते हैं कि 1960 के दशक की शुरुआत में लता मंगेशकर एक कठिन दौर से गुजर रही थीं। लगातार रिकॉर्डिंग और व्यस्त दिनचर्या के बीच उन्हें महसूस होने लगा था कि ऊंचे सुरों पर जाते समय उनकी आवाज़ पहले जैसी नहीं रह गई है। हाई नोट्स गाते वक्त स्वर सपाट पड़ने लगे थे और उनकी गायकी में वह सहजता नहीं बची थी, जिसके लिए उन्हें जाना जाता था।
यह स्थिति उनके लिए बेहद चिंताजनक थी, क्योंकि उस समय वह अपने करियर के शिखर पर थीं। अपनी समस्या को लेकर उन्होंने मशहूर शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खान से सलाह ली। उस्ताद ने उन्हें एक बेहद सरल लेकिन प्रभावी सुझाव दिया—कुछ समय के लिए पूरी तरह मौन रहकर अपनी आवाज़ को आराम दें। उन्होंने कहा कि अगर लंबे समय तक गायन से दूरी बनाई जाए तो वोकल कॉर्ड्स को दोबारा मजबूती मिल सकती है।
लगभग एक साल तक नहीं गाया कोई गीतउस्ताद की सलाह को गंभीरता से लेते हुए लता मंगेशकर ने खुद को गायकी से लगभग पूरी तरह अलग कर लिया। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि उस दौर में वह फिल्म इंडस्ट्री की सबसे व्यस्त और लोकप्रिय गायिका थीं। बावजूद इसके उन्होंने अपनी सेहत और आवाज़ को प्राथमिकता दी।
करीब एक साल तक उन्होंने सार्वजनिक रूप से गाना लगभग बंद रखा और अपनी आवाज़ को आराम दिया। इस दौरान संगीत जगत में उनके प्रशंसकों को उनकी वापसी का इंतजार था। आखिरकार जब वह दोबारा रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंचीं, तो उनके सामने एक ऐसा गीत था जो आगे चलकर इतिहास रचने वाला था।
‘बीस साल बाद’ से हुआ यादगार कमबैकलंबे अंतराल के बाद लता मंगेशकर ने फिल्म 'बीस साल बाद' के लिए कहीं दीप जले कहीं दिल रिकॉर्ड किया। यह उनकी वापसी के बाद की शुरुआती रिकॉर्डिंग्स में से एक थी। फिल्म का निर्देशन बिरेन नाग ने किया था और इसमें वहीदा रहमान तथा विश्वजीत मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे।
फिल्म की रहस्य और रोमांच से भरपूर कहानी में इस गीत का इस्तेमाल बेहद प्रभावशाली ढंग से किया गया था। जैसे ही पर्दे पर यह गीत सुनाई देता, दर्शकों के मन में रोमांच और रहस्य का माहौल बन जाता। गीत की धुन संगीतकार हेमंत कुमार ने तैयार की थी, जबकि इसके बोल प्रसिद्ध गीतकार शकील बदायुनी ने लिखे थे। संगीत, शब्द और लता जी की आवाज़ का यह संगम दर्शकों के दिलों में बस गया।
फिल्मफेयर अवॉर्ड के साथ रचा इतिहास
इस गीत की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके लिए लता मंगेशकर को वर्ष 1963 में सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। वहीं गीतकार शकील बदायुनी को भी उनके शानदार बोलों के लिए सम्मानित किया गया।
यह लता मंगेशकर के करियर का दूसरा फिल्मफेयर अवॉर्ड था। इससे पहले उन्हें 1959 में फिल्म 'मधुमती' के मशहूर गीत आजा रे परदेसी के लिए यह सम्मान मिला था। कहीं दीप जले कहीं दिल को आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन हॉन्टिंग मेलोडी गीतों में शामिल किया जाता है।
संगीत के प्रति समर्पण की मिसाल थीं लता जीलता मंगेशकर की यह कहानी केवल एक गीत की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उनके समर्पण, अनुशासन और संगीत के प्रति गहरे प्रेम की भी मिसाल है। करियर के सबसे सफल दौर में भी उन्होंने अपनी आवाज़ की सेहत को प्राथमिकता दी और धैर्य के साथ सही समय का इंतजार किया।
शायद यही वजह है कि दशकों बाद भी कहीं दीप जले कहीं दिल सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय संगीत इतिहास का एक अमर अध्याय माना जाता है। यह गाना आज भी सुनने वालों को उसी तरह रोमांचित करता है, जैसे 64 साल पहले किया करता था।