‘लग जा गले’ को सुनकर पहले ही ठुकरा दिया था डायरेक्टर ने, फिर ऐसा क्या हुआ कि खुद पर ही होने लगा अफसोस? जानिए 62 साल पुराना किस्सा

हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में कुछ गीत ऐसे हैं, जो समय की सीमाओं को पार कर पीढ़ियों तक लोगों के दिलों में बसे रहते हैं। ऐसा ही एक गीत है ‘लग जा गले’, जिसे सुनते ही आज भी श्रोताओं की भावनाएं उमड़ पड़ती हैं। फिल्म ‘वो कौन थी’ का यह सदाबहार गाना दशकों बाद भी उतना ही लोकप्रिय है, जितना अपनी रिलीज के समय था। लेकिन इस अमर गीत से जुड़ा एक ऐसा दिलचस्प किस्सा भी है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। हैरानी की बात यह है कि जिस धुन को आज संगीत की उत्कृष्ट रचनाओं में गिना जाता है, उसे शुरुआत में फिल्म के निर्देशक राज खोसला ने पसंद ही नहीं किया था।

स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि उन्होंने संगीतकार मदन मोहन के सामने अपनी निराशा भी जाहिर कर दी थी। हालांकि बाद में घटनाक्रम ऐसा बदला कि वही गीत फिल्म की सबसे बड़ी पहचान बन गया और भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।

रहस्य और रोमांच के बादशाह थे राज खोसला

9 जून को राज खोसला की पुण्यतिथि के अवसर पर उनके जीवन से जुड़ा यह रोचक प्रसंग अक्सर याद किया जाता है। राज खोसला हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के उन चुनिंदा निर्देशकों में शामिल थे, जिन्होंने सस्पेंस, रोमांस और रहस्य से भरपूर फिल्मों के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई थी। उनकी फिल्मों में कहानी कहने का अंदाज ऐसा होता था कि दर्शक अंतिम दृश्य तक स्क्रीन से जुड़े रहते थे।

31 मई 1925 को पंजाब में जन्मे राज खोसला ने अपने लंबे फिल्मी सफर में कई यादगार फिल्मों का निर्देशन किया। अभिनेत्री साधना के साथ उनकी जोड़ी विशेष रूप से सफल मानी जाती है। ‘वो कौन थी’, ‘मेरा साया’ और ‘अनीता’ जैसी फिल्मों ने उन्हें सस्पेंस फिल्मों का मास्टर निर्देशक बना दिया। आज भी इन फिल्मों को हिंदी सिनेमा की क्लासिक थ्रिलर फिल्मों में गिना जाता है।

जब पहली बार सुनाई गई ‘लग जा गले’ की धुन

1964 में रिलीज हुई फिल्म ‘वो कौन थी’ में मनोज कुमार और साधना मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। फिल्म का संगीत मशहूर संगीतकार मदन मोहन ने तैयार किया था, जिनकी धुनों को आज भी संगीत प्रेमी बड़े सम्मान से याद करते हैं। इसी फिल्म के लिए उन्होंने ‘लग जा गले’ जैसी मधुर और भावनात्मक धुन बनाई थी।

मदन मोहन के बेटे समीर कोहली ने एक इंटरव्यू के दौरान इस गीत के निर्माण से जुड़ा दिलचस्प किस्सा साझा किया था। उनके अनुसार, जब मदन मोहन ने पहली बार यह धुन राज खोसला को सुनाई, तो निर्देशक उससे बिल्कुल प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें मदन मोहन से इससे कहीं बेहतर संगीत की उम्मीद थी।

राज खोसला को उस समय लगा कि यह धुन फिल्म के मूड और कहानी के अनुरूप पर्याप्त प्रभावशाली नहीं है। यही वजह थी कि उन्होंने इसे लेकर नाखुशी जाहिर की और इसे तुरंत स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे।
मदन मोहन को था अपनी धुन पर पूरा विश्वास

हालांकि राज खोसला की प्रतिक्रिया से मदन मोहन निराश जरूर हुए, लेकिन उन्हें अपनी रचना की क्षमता पर पूरा भरोसा था। उनका मानना था कि यह धुन असाधारण है और एक बार सही तरीके से सुनने पर हर किसी के दिल को छू लेगी। इसी बीच फिल्म की टीम की एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें कई महत्वपूर्ण लोग मौजूद थे।

इस दौरान अभिनेता मनोज कुमार ने भी इस धुन का समर्थन किया। उन्होंने राज खोसला से अनुरोध किया कि वे जल्दबाजी में फैसला न लें और एक बार फिर पूरे ध्यान के साथ इस धुन को सुनें। मनोज कुमार का मानना था कि इस गीत में कुछ ऐसा खास है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

दूसरी बार सुनने के बाद बदल गई राय

मनोज कुमार के आग्रह पर जब मदन मोहन ने दोबारा ‘लग जा गले’ की धुन सुनाई, तो माहौल पूरी तरह बदल गया। इस बार राज खोसला ने गीत को सिर्फ एक धुन की तरह नहीं, बल्कि उसकी भावनात्मक गहराई और संवेदनशीलता के साथ महसूस किया। जैसे-जैसे धुन आगे बढ़ी, उन्हें उसकी खूबसूरती का एहसास होने लगा।

धुन खत्म होते ही राज खोसला को अपनी पहली प्रतिक्रिया पर पछतावा हुआ। कहा जाता है कि उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि इतनी शानदार धुन को खारिज करने के लिए उनका मन कर रहा है कि अपना जूता उठाकर खुद को मार लें। यह टिप्पणी उनकी हैरानी और आत्मग्लानि दोनों को दर्शाती थी।

समय ने साबित कर दिया फैसला कितना सही था

बाद के वर्षों में मनोज कुमार भी गर्व के साथ इस बात का जिक्र करते थे कि उन्होंने इस गीत को फिल्म में बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यदि उस समय यह धुन हटा दी जाती, तो शायद हिंदी फिल्म संगीत एक अनमोल रचना से वंचित रह जाता।

समय के साथ ‘लग जा गले’ सिर्फ एक लोकप्रिय गीत नहीं रहा, बल्कि भारतीय संगीत विरासत का अभिन्न हिस्सा बन गया। लता मंगेशकर की भावपूर्ण आवाज, मदन मोहन का संगीत और राजा मेहंदी अली खान के शब्दों ने मिलकर ऐसा जादू रचा, जो 62 साल बाद भी लोगों के दिलों पर उसी तरह राज कर रहा है। आज भी यह गीत सुनते ही भावनाओं की एक अलग दुनिया जीवंत हो उठती है और यही इसकी अमरता की सबसे बड़ी पहचान है।