1984 का दौर था और निर्देशक प्रकाश मेहरा अपनी चर्चित फिल्म ‘शराबी’ को अंतिम रूप देने में जुटे हुए थे। फिल्म के गीत-संगीत पर विशेष ध्यान दिया जा रहा था। गीतकार अंजान ने एक बेहद भावनात्मक और दिल को छू लेने वाला गीत लिखा, जबकि संगीतकार बप्पी लाहिड़ी ने उसे यादगार धुन में ढाल दिया। अब बारी थी उस गीत को आवाज देने की, और इसके लिए चुना गया था हिंदी सिनेमा के महान गायक किशोर कुमार को। लेकिन जब किशोर दा ने पहली बार इस गाने की स्थिति और भावनात्मक पृष्ठभूमि के बारे में सुना, तो उन्होंने तुरंत इसे गाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई और रिकॉर्डिंग से इंकार कर दिया।
स्टूडियो में मौजूद लोगों को यह समझ नहीं आया कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि हर तरह के गीत को अपनी आवाज से अमर बनाने वाले किशोर कुमार इस गाने से पीछे हट रहे हैं। कुछ देर तक माहौल गंभीर बना रहा। हालांकि जो लोग किशोर दा को करीब से जानते थे, उन्हें मालूम था कि उनके फैसलों के पीछे अक्सर कोई अनोखी सोच या रचनात्मक प्रयोग छिपा होता था। कुछ समय बाद उन्होंने गाना गाने की सहमति तो दे दी, लेकिन इसके साथ एक ऐसी शर्त रख दी जिसने वहां मौजूद सभी लोगों को चौंका दिया।
किशोर कुमार का मानना था कि किसी भी गीत को गाने से पहले उसके भाव को पूरी तरह महसूस करना जरूरी है। उन्हें बताया गया कि फिल्म में यह गीत अमिताभ बच्चन के किरदार पर फिल्माया जाएगा, जो उस समय शराब के नशे में दिखाई देगा। यह सुनते ही किशोर दा ने कहा कि अगर गीत में एक शराबी की मनःस्थिति और उसकी भावनाओं को सही ढंग से उतारना है, तो उन्हें सामान्य तरीके से खड़े होकर नहीं गाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वह यह गीत लेटकर गाना चाहते हैं ताकि उस किरदार की अवस्था को बेहतर ढंग से महसूस कर सकें।
उनकी यह बात सुनकर रिकॉर्डिंग टीम कुछ पल के लिए हैरान रह गई। किसी ने पहले कभी ऐसा प्रयोग नहीं देखा था। लेकिन किशोर दा अपने निर्णय पर अडिग रहे। आखिरकार उनकी बात मान ली गई और रिकॉर्डिंग स्टूडियो में तुरंत व्यवस्था बदलनी पड़ी। कर्मचारियों को बुलाकर कमरे में एक बड़ी टेबल रखवाई गई ताकि किशोर कुमार आराम से उस पर लेटकर गीत रिकॉर्ड कर सकें।
जब सारी तैयारियां पूरी हो गईं तो किशोर कुमार टेबल पर लेट गए। माइक्रोफोन को उसी हिसाब से सेट किया गया और रिकॉर्डिंग शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने आशा भोसले के साथ मिलकर वह मशहूर गीत गाया—‘इंतहा हो गई इंतजार की…’। रिकॉर्डिंग के दौरान उनकी आवाज में जो नशे की हल्की खुमारी, दर्द और भावनात्मक गहराई सुनाई दी, उसने वहां मौजूद सभी लोगों को प्रभावित कर दिया।
कहा जाता है कि रिकॉर्डिंग के समय आशा भोसले भी किशोर दा के इस अंदाज को देखकर हैरान रह गई थीं। उन्होंने देखा कि किस तरह एक कलाकार अपने किरदार और गीत की भावना को महसूस करने के लिए अलग सोच अपनाता है। किशोर कुमार की यह अनोखी कार्यशैली उनकी रचनात्मकता का प्रमाण थी। बाद में इस पूरे किस्से का जिक्र खुद आशा भोसले ने एक इंटरव्यू में किया था, जिसने इस कहानी को और भी दिलचस्प बना दिया।
जब ‘इंतहा हो गई इंतजार की’ रिलीज हुआ तो यह देखते ही देखते श्रोताओं की जुबान पर चढ़ गया। रेडियो से लेकर मंचों तक यह गीत खूब बजा और लोगों ने इसे हाथोंहाथ लिया। दशकों बाद भी यह गाना उतना ही लोकप्रिय है और आज भी इसके बोल तथा धुन लोगों को झूमने पर मजबूर कर देते हैं। कई संगीत प्रेमी मानते हैं कि इस गीत में जो वास्तविक एहसास सुनाई देता है, उसके पीछे किशोर कुमार का वही अनोखा प्रयोग छिपा था।
फिल्म ‘शराबी’ भी अपने समय की सबसे सफल फिल्मों में शामिल रही। अमिताभ बच्चन के अभिनय, दमदार संवादों और शानदार संगीत ने इसे क्लासिक फिल्मों की सूची में जगह दिलाई। प्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी इस फिल्म के गीत आज भी संगीत प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। फिल्म के संगीत के लिए बप्पी लाहिड़ी को खूब सराहना मिली, जबकि किशोर कुमार को ‘मंजिलें अपनी जगह हैं’ गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का सम्मान भी प्राप्त हुआ। यही वजह है कि ‘शराबी’ और उससे जुड़े ऐसे दिलचस्प किस्से आज भी बॉलीवुड इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हैं।