भारतीय संस्कृति में देवी-देवताओं के दर्शन को जीवन के पापों से मुक्ति का साधन माना गया है। इसलिए लगभग हर घर में एक छोटा मंदिर अवश्य होता है, जिसमें प्रतिदिन पूजा-अर्चना की जाती है। यह न केवल आध्यात्मिक शांति देता है, बल्कि घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने का माध्यम भी बनता है। आजकल जब वास्तुशास्त्र के प्रति लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है, तब यह सवाल भी तेजी से उठता है कि घर में मंदिर या पूजा स्थान किस दिशा में होना चाहिए?
वास्तुशास्त्र के अनुसार भवन का प्रत्येक कोना एक विशिष्ट ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। इनमें सबसे शुभ और पवित्र कोण ईशान कोण माना गया है। यही कारण है कि जब भी किसी घर में वास्तु दोष की बात होती है, तो सबसे पहले पूजा घर की दिशा पर ध्यान दिया जाता है। अगर पूजा स्थल वास्तु के अनुसार न हो, तो परिवार में मानसिक अशांति, बीमारियां और आपसी मतभेद जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
ईशान कोण: सर्वश्रेष्ठ दिशा पूजा घर के लिएईशान कोण, यानी उत्तर-पूर्व दिशा, को देवताओं का स्थान माना गया है। यह दिशा गुरु ग्रह से जुड़ी होती है, जो ज्ञान, धर्म और शुभता का प्रतीक है। यदि पूजा घर इसी दिशा में हो, तो परिवार के सदस्यों के विचार सात्विक होते हैं, उनका स्वास्थ्य उत्तम रहता है और वे दीर्घायु होते हैं। यह दिशा आध्यात्मिक उन्नति के लिए सबसे अनुकूल मानी जाती है।
पूर्व दिशा: प्रतिष्ठा और सात्विकता की ओरयदि किसी घर में पूजा स्थान पूर्व दिशा में हो, तो घर का मुखिया समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। यह दिशा भी सकारात्मक ऊर्जा देने वाली मानी जाती है और इससे परिवार में शांति और अनुशासन बना रहता है। पूर्व दिशा सूर्य के उदय की दिशा भी है, इसलिए इसे ज्ञान और प्रकाश की दिशा भी माना जाता है।
आग्नेय कोण: साहस के साथ क्रोध भी देता हैदक्षिण-पूर्व या आग्नेय कोण अग्नि तत्व से संबंधित होता है। इस दिशा में पूजा घर होने पर व्यक्ति साहसी और आत्मनिर्भर तो होता है, लेकिन उसमें क्रोध अधिक होता है। वह प्रत्येक कार्य का निर्णय स्वयं लेता है और प्रबल इच्छा शक्ति का परिचय देता है, लेकिन रक्त विकार या उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
दक्षिण दिशा: जिद्द और भावनात्मक अस्थिरतादक्षिण दिशा को पितरों की दिशा भी कहा गया है। यदि पूजा घर इस दिशा में हो, तो वह व्यक्ति भावनात्मक रूप से अत्यधिक संवेदनशील और जिद्दी हो सकता है। गुस्सा उसकी प्रवृत्ति में शामिल होता है और वह दूसरों की बातों को लेकर जल्दी आहत हो जाता है। यह दिशा पूजा के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती।
नैऋत्य कोण: लालच और पेट संबंधी समस्याएंदक्षिण-पश्चिम दिशा, जिसे नैऋत्य कोण कहा जाता है, वास्तु में स्थायित्व की दिशा मानी जाती है। लेकिन यदि इस दिशा में मंदिर बना दिया जाए, तो यह नकारात्मक प्रभाव देने लगती है। इस दिशा में पूजा घर होने से घर के सदस्यों में लालच, असंतोष और पेट से संबंधित रोग बढ़ सकते हैं।
उत्तर दिशा: आर्थिक लाभ और मानसिक शांतिउत्तर दिशा को कुबेर की दिशा माना गया है। यहां पूजा स्थान रखने से घर में लक्ष्मी का वास होता है और परिवार के सदस्यों में मानसिक शांति बनी रहती है। यह दिशा विशेष रूप से आर्थिक उन्नति के लिए शुभ मानी जाती है।
वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में पूजा घर की दिशा का सीधा संबंध वहां रहने वालों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक जीवन से होता है। अगर पूजा स्थान ईशान कोण में हो, तो यह सर्वोत्तम माना जाता है, लेकिन कुछ आवश्यक परिस्थितियों में पूर्व या उत्तर दिशा भी उपयुक्त हो सकती हैं। जबकि आग्नेय, दक्षिण या नैऋत्य कोण में मंदिर रखने से कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
इसलिए यदि घर में समस्याएं चल रही हों, तो बिना कोई तोड़फोड़ किए पहले पूजा घर की दिशा का वास्तु के अनुसार विश्लेषण अवश्य करें। कभी-कभी छोटी सी दिशा-सुधार से बड़ा लाभ प्राप्त हो सकता है।