कार्तिक मास की रमा एकादशी पर सूर्य का राशि परिवर्तन, भगवान विष्णु और सूर्य देव की एकसाथ पूजा का मिलेगा दुर्लभ लाभ

इस वर्ष रमा एकादशी का पर्व एक विशेष ज्योतिषीय संयोग लेकर आ रहा है। 17 अक्टूबर 2025 को जहां एक ओर कार्तिक मास की रमा एकादशी पड़ रही है, वहीं दूसरी ओर इसी दिन सूर्य देव का राशि परिवर्तन भी हो रहा है। यह संयोग भक्तों के लिए अत्यंत शुभ और दुर्लभ माना जा रहा है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु और सूर्य देव की एकसाथ पूजा करने से जीवन में विशेष फल प्राप्त होता है।

रमा एकादशी को वैसे भी भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति का दिन माना जाता है, लेकिन जब यही तिथि सूर्य के राशि परिवर्तन के साथ आ जाए, तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन किए गए उपवास, दान, जाप और पूजा का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक होता है। यह तिथि साधकों के लिए आध्यात्मिक जागरण, जीवन की बाधाओं से मुक्ति और मानसिक बल की प्राप्ति का उत्तम अवसर बनकर आई है।

सूर्य देव का तुला राशि में गोचर: जीवन में संतुलन और आत्मबल का संचार

17 अक्टूबर को सूर्य देव दोपहर 1 बजकर 53 मिनट पर तुला राशि में प्रवेश करेंगे। तुला राशि का स्वामी शुक्र होता है, जो शांति, सौंदर्य और संतुलन का प्रतीक है। सूर्य और शुक्र के इस मेल को ज्योतिष में शुभ संयोग के रूप में देखा जाता है। यह गोचर उन लोगों के लिए विशेष फलदायी माना गया है, जो अपनी कार्यक्षमता, आत्मविश्वास और जीवन में स्थायित्व की तलाश कर रहे हैं। सूर्य ग्रह आत्मा, प्रतिष्ठा और ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है, और जब वह तुला राशि में आता है, तो जीवन में विचारों का संतुलन और संबंधों में मधुरता आने लगती है।

विष्णु और सूर्य की एकसाथ पूजा का महत्व


रमा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। इस दिन माता लक्ष्मी के साथ श्री हरि की पूजा से व्यक्ति के जीवन से दरिद्रता दूर होती है और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। जब इस व्रत के दिन सूर्य का राशि परिवर्तन हो रहा हो, तो यह एक शक्तिशाली योग बनाता है। भगवान विष्णु जीवन के पालनकर्ता हैं और सूर्य जीवन के ऊर्जा स्रोत। इन दोनों की एकसाथ उपासना से जीवन में धर्म, ऊर्जा, संतुलन और सफलता का समन्वय होता है।

सूर्य को अर्घ्य देना और आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी

रमा एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान कर तांबे के पात्र में जल, लाल पुष्प और रोली डालकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। साथ ही “आदित्य हृदय स्तोत्र” का पाठ करने से आत्मबल में वृद्धि, रोगों से राहत और मानसिक शांति प्राप्त होती है। इस दिन सूर्य और मंगल से संबंधित वस्तुएं जैसे लाल वस्त्र, गेहूं, गुड़, तांबा आदि का दान करने से पापों का नाश होता है और जीवन में शुभता आती है।

रमा एकादशी व्रत का महत्व और विधि


रमा एकादशी का व्रत बेहद पवित्र और फलदायी माना जाता है। भक्त इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं। सुबह स्नान के बाद स्वच्छ पीला वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने पूजा की जाती है। पूजा में रोली, चंदन, पीले फूल, तुलसी पत्र, फल और मिठाई अर्पित की जाती है। इस दिन विष्णु सहस्रनाम, लक्ष्मी स्तोत्र और रमा एकादशी व्रत कथा का श्रवण कर आरती की जाती है। अगले दिन द्वादशी को पारण कर व्रत संपन्न होता है।

धार्मिक अनुशासन और संयम का दिन


यह पर्व केवल उपवास का नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन और मन की शुद्धि का प्रतीक है। रमा एकादशी पर व्रत रखने वाले को क्रोध, असत्य, छल, कटु वचन, और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। दिनभर भगवान का स्मरण करते हुए दया, संयम और सेवा भाव अपनाना इस व्रत को पूर्ण बनाता है। यह दिन केवल धर्म-कर्म का ही नहीं, बल्कि आंतरिक विकास का अवसर भी होता है।

जीवन में शुभता और उन्नति का संयोग


2025 की रमा एकादशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि एक दिव्य संयोग बनकर आई है। सूर्य का तुला राशि में प्रवेश और भगवान विष्णु की पूजा एक ही दिन होने से साधकों को दोगुना लाभ मिलने की संभावना है। यह दिन उन सभी के लिए विशेष है, जो जीवन में स्थायित्व, संतुलन, ऊर्जा और ईश्वरीय कृपा की कामना करते हैं। श्रद्धा, नियम और समर्पण के साथ इस दिन का पालन करने से निश्चित ही जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है और आत्मिक संतुलन की प्राप्ति होती है।